• कन्फ़्यूशियस

    कंफ्यूशियसी दर्शन की शुरुआत 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व चीन में हुई। जिस समय भारत में भगवान महावीऔर बुद्ध धर्म के संबध में नए विचार रख रहें थे, चीन में भी एक महात...

  • कठरूद्रोपनिषद

    कठरूद्रोपनिषद कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख...

  • ऋषभदेव

    भगवान ऋषभदेव जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं। तीर्थंकर का अर्थ होता है जो तीर्थ की रचना करें। जो संसार सागर से मोक्ष तक के तीर्थ की रचना करें, वह तीर्थंकर कहल...

  • उपयोगितावाद

    उपयोगितावाद एक आचार सिद्धांत है जिसकी एकांतिक मान्यता है कि आचरण एकमात्र तभी नैतिक है जब वह अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख की अभिवृद्धि करता है। राजनीतिक तथ...

  • उपनिषद्

    उपनिषद् हिन्दू धर्म के महत्त्वपूर्ण श्रुति धर्मग्रन्थ हैं। ये वैदिक वाङ्मय के अभिन्न भाग हैं। ये संस्कृत में लिखे गये हैं। इनकी संख्या लगभग २०० है, किन्तु मु...

  • उपदेशवाद

    साहित्य के माध्यम से उपदेश देने की प्रवृत्ति को उपदेशवाद की संज्ञा दी गई है। अंग्रेजी में इससे संबद्ध पर्याप्त साहित्य मिलता है, लेकिन हिंदी के नीतिकाव्य को ...

  • उद्देश्यवाद

    उद्देश्यवाद के अनुसार प्रत्येक कार्य या रचना में कोई उद्देश्य, प्रयोजन या अंतिम कारण निहित रहता है जो उसके संपादनार्थ प्रेरणा प्रदान किया करता है। इसे प्रयोज...

  • आशावाद

    आशावाद उस मानसिक स्थिति को कहते हैं जिसमें व्यक्ति सर्वोत्तम फल के प्रति आशान्वित हो। दार्शनिक रूप से यह निराशावाद का विलोम है। आशावादियों में प्राय: यह प्रब...

  • आर्यसत्य

    आर्यसत्य की संकल्पना बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत है। इसे संस्कृत में चत्वारि आर्यसत्यानि और पालि में चत्तरि अरियसच्चानि कहते हैं आर्यसत्य चार हैं- 1 दुःख: सं...

  • आरूणकोपनिषद

    आरूणकोपनिषद सामवेदिय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्यत वेदव्य...

  • आनंदवाद

    आनंदवाद उस विचारधारा का नाम है जिसमें आनंद को ही मानव जीवन का मूल लक्ष्य माना जाता है। विश्व की विचारधारा में आनंदवाद के दो रूप मिलते हैं। प्रथम विचार के अनु...

  • आधार (तर्क)

    तर्कशास्त्र में आधार ऐसा कथन होता है जिसके बारे में यह दावा करा जा रहा हो कि उसकी सच्चाई के फलस्वरूप कोई अन्य निष्कर्ष भी सत्य है। किसी तर्क में आधार के रूप ...

  • आत्मोपनिरूषद

    आत्मोपनिरूषद अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्यत वेद...

  • आत्मा

    आत्मा या आत्मन् पद भारतीय दर्शन के महत्त्वपूर्ण प्रत्ययों में से एक है। यह उपनिषदों के मूलभूत विषय-वस्तु के रूप में आता है। जहाँ इससे अभिप्राय व्यक्ति में अन...

  • आत्मबोधोपनिषद

    आत्मबोधोपनिषद ॠग्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्यत वेदव...

  • आजीविक

    आजीविक या ‘आजीवक’, दुनिया की प्राचीन दर्शन परंपरा में भारतीय जमीन पर विकसित हुआ पहला नास्तिकवादी या भौतिकवादी सम्प्रदाय था। भारतीय दर्शन और इतिहास के अध्येता...

  • आकस्मिकवाद

    आकस्मिकवाद दार्शनिक मत ; घटनाओं के अकारण घटित होने का सिद्धांत। यूनान के महान दार्शनिक प्लेटो ने इसका प्रतिपादन किया। सीमाविशेष तक अरस्तू भी इसके समर्थक थे। ...

  • अहंवाद

    अहंवाद उस दार्शनिक सिद्धांत को कहते है जिसके अनुसार केवल ज्ञाता एवं उसकी मनोदशाओं की ही सत्ता है, दूसरी किसी वस्तु की नहीं। दर्शन के इतिहास में अहंवाद के किस...

  • अस्तित्ववाद

    अस्तित्ववाद अस्तित्ववाद मानव केंद्रित दृष्टिकोण हैं अर्थात् वह सम्पूर्ण जगत में मानव को सबसे अधिक प्रदान करता हैं उसकी दृष्टि में मानव एकमात्र साध्य है । प्र...

  • अवधारणा

    अवधारणा या संकल्पना भाषा दर्शन का शब्द है जो संज्ञात्मक विज्ञान, तत्त्वमीमांसा एवं मस्तिष्क के दर्शन से सम्बन्धित है। इसे अर्थ की संज्ञात्मक ईकाई; एक अमूर्त ...

  • अराजकतावाद

    अराजकतावाद एक राजनीतिक दर्शन है, जो स्वैच्छिक संस्थानों पर आधारित स्वाभिशासित समाजों की वक़ालत करता है। इनका वर्णन अक्सर राज्यहीन समाजों के रूप में होता है, ...

  • अराजकता

    अराजकता एक आदर्श है जिसका सिद्धांत अराजकतावाद है। अराजकतावाद राज्य को समाप्त कर व्यक्तियों, समूहों और राष्ट्रों के बीच स्वतंत्और सहज सहयोग द्वारा समस्त मानवी...

  • अरब का दर्शन

    अरबी दर्शन का विकास चार मंजिलों से होकर गुजरा है: 1 यूनानी ग्रंथों का सामी तथा मुसलमानों द्वारा किया अनुवाद तथा विवेचन, यह युग अनुवादों का है; 2 बुद्धिपरक हे...

  • अमृतनादोपनिषद

    अमृतनादोपनिषद कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख...

  • अन्नपूर्णा उपनिषद

    अन्नपूर्णा उपनिषद अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्य...

  • अनुभववाद

    अनुभववाद एक दार्शनिक सिद्धांत है जिसमें इंद्रियों को ज्ञान का माध्यम माना जाता है और जिसका मनोविज्ञान के संवेदनवाद का विकास अनुभववाद में हुआ। इस वाद के अनुसा...

  • अनुभव

    प्रयोग अथवा परीक्षा द्वारा प्राप्त ज्ञान अनुभव कहलाता है। प्रत्यक्ष ज्ञान अथवा बोध। स्मृति से भिन्न ज्ञान। तर्कसंग्रह के अनुसार ज्ञान के दो भेद हैं - स्मृति ...

  • अनिर्वचनीय ख्यातिवाद

    ----- आदि शंकराचार्य का भ्रम विचार इस नाम से जाना जाता है, इनके अनुसार ब्रह्म अविधा अहि, अविधा तथा इन्द्रियादिदोष के कारण सीपी मॅ रजत की प्रतीति होती है उनके...

  • अनंत

    अनंत का अर्थ होता है जिसका कोई अंत न हो। इसको ∞ से निरूपित करते हैं। यह गणित और दर्शन में एक कांसेप्ट है जो ऐसी राशि को कहते हैं जिसकी कोई सीमा न हो या अन्त ...

  • अध्यात्मोपनिषद

    अध्यात्मोपनिषद शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मु...

  • अध्यात्मवाद

    अध्यात्मवाद आत्मा को जगत का मूल मानने वाला एक प्रत्ययवादी विचार है। अध्यात्मवाद के एक मत के अनुसार भौतिक जगत परमात्मा तथा उसके गुणों की अभिव्यक्ति का माध्यम ...

  • अद्वयतारकोपनिषद

    अद्वयतारकोपनिषद शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु म...

  • अथर्वशिर उपनिषद

    अथर्वशिर उपनिषद अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्यत ...

  • अथर्वशिखा उपनिषद

    अथर्वशिखा उपनिषद अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्यत...

  • अतियथार्थवाद

    अतियथार्थवाद, कला और साहित्य के क्षेत्र में प्रथम महायुद्ध के लगभग प्रचलित होने वाली शैली और आंदोलन था। चित्रण और मूर्तिकला में तो यह आधुनिकतम शैली और तकनीक ...

  • अणुवाद

    अणुवाद दर्शन में प्रकृति के अल्पतम अंश को अणु या परमाणु कहते हैं। अणुवाद का दावा है कि प्रत्येक प्राकृत पदार्थ अणुओं से बना है और पदार्थों का बनना तथा टूटना ...

  • अज्ञेयवाद

    अज्ञेयवाद ज्ञान मीमांसा का विषय है, यद्यपि उसका कई पद्धतियों में तत्व दर्शन से भी संबंध जोड़ दिया गया है। इस सिद्धांत की मान्यता है कि जहाँ विश्व की कुछ वस्त...

  • अक्षि उपनिषद

    अक्षि उपनिषद कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्...

  • अंतोनियो ग्राम्शी

    अंतोनियो ग्राम्शी इटली की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक, मार्क्सवाद के सिद्धांतकार तथा प्रचारक थे। बीसवीं सदी के आरंभिक चार दशकों के दौरान दक्षिणपंथी फ़ासीवा...

अंतोनियो ग्राम्शी

अंतोनियो ग्राम्शी इटली की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक, मार्क्सवाद के सिद्धांतकार तथा प्रचारक थे। बीसवीं सदी के आरंभिक चार दशकों के दौरान दक्षिणपंथी फ़ासीवा...

अक्रियावाद

अक्रियावाद बुद्ध के समय का एक प्रख्यात दार्शनिक मतवाद। महावीर तथा बुद्ध से पूर्व के युग में भी इस मत का बड़ा बोलबाला था। इसके अनुसार न तो कोई कर्म है, न कोई ...

अक्षि उपनिषद

अक्षि उपनिषद कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्...

अजातिवाद

गौडपादाचार्य ने मांडूक्यकारिका में सिद्ध किया है कि कोई भी वस्तु कथमपि उत्पन्न नहीं हो सकती। अनुत्पत्ति के इसी सिद्धांत को अजातिवाद कहते हैं। गौडपादाचार्य के...

अज्ञेयवाद

अज्ञेयवाद ज्ञान मीमांसा का विषय है, यद्यपि उसका कई पद्धतियों में तत्व दर्शन से भी संबंध जोड़ दिया गया है। इस सिद्धांत की मान्यता है कि जहाँ विश्व की कुछ वस्त...

अणुवाद

अणुवाद दर्शन में प्रकृति के अल्पतम अंश को अणु या परमाणु कहते हैं। अणुवाद का दावा है कि प्रत्येक प्राकृत पदार्थ अणुओं से बना है और पदार्थों का बनना तथा टूटना ...

अतियथार्थवाद

अतियथार्थवाद, कला और साहित्य के क्षेत्र में प्रथम महायुद्ध के लगभग प्रचलित होने वाली शैली और आंदोलन था। चित्रण और मूर्तिकला में तो यह आधुनिकतम शैली और तकनीक ...

अथर्वशिखा उपनिषद

अथर्वशिखा उपनिषद अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्यत...

अथर्वशिर उपनिषद

अथर्वशिर उपनिषद अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्यत ...

अद्वयतारकोपनिषद

अद्वयतारकोपनिषद शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु म...

अधिकार (तंत्रशास्त्र)

तंत्रशास्त्र की दृष्टि से अधिकार शब्द का मूल्य साधनात्मक है। साधना में प्रवेश पाने के लिए जिस योग्यता, क्षमता की प्राप्ति आवश्यक होती है, उसे अधिकार कहते हैं...

अधिरचना

आधाऔर अधिरचना ऐतिहासिक भौतिकवाद के प्रवर्ग, जो प्रत्येक सामाजिक-आर्थिक ढाँचे के आधारभूत संरचनात्मक तत्त्वों को अभिलक्षित करने के लिए तैयार किये गये, हेतु व्य...

अध्यात्मवाद

अध्यात्मवाद आत्मा को जगत का मूल मानने वाला एक प्रत्ययवादी विचार है। अध्यात्मवाद के एक मत के अनुसार भौतिक जगत परमात्मा तथा उसके गुणों की अभिव्यक्ति का माध्यम ...

अध्यात्मोपनिषद

अध्यात्मोपनिषद शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मु...

अध्यास

अध्यास, अद्वैत वेदांत का पारिभाषिक शब्द है। एक वस्तु में दूसरी वस्तु का ज्ञान अध्यास कहलाता है। रस्सी को देखकर सर्प का ज्ञान इसका उदाहरण है। यहाँ पर रस्सी सत...

अनंत

अनंत का अर्थ होता है जिसका कोई अंत न हो। इसको ∞ से निरूपित करते हैं। यह गणित और दर्शन में एक कांसेप्ट है जो ऐसी राशि को कहते हैं जिसकी कोई सीमा न हो या अन्त ...

अनलहक

अनलहक सूफियों की एक इत्तला है जिसके द्वारा वे आत्मा को परमात्मा की स्थिति में लय कर देते है। सूफियों के यहाँ खुदा तक पहुँचने के चार दर्जे है। जो व्यक्ति सूफि...

अनिर्वचनीय ख्यातिवाद

----- आदि शंकराचार्य का भ्रम विचार इस नाम से जाना जाता है, इनके अनुसार ब्रह्म अविधा अहि, अविधा तथा इन्द्रियादिदोष के कारण सीपी मॅ रजत की प्रतीति होती है उनके...

अनीश्वरवादी अस्तित्ववाद

मार्टिन हाइडेगर, ज्याँ पाल सार्त्र, आल्बेर कामु आदि अनीश्वरवादी अस्तित्ववाद के विचारकों ने मनुष्य को अकेला और निस्सहाय माना है। नित्शे के अनुसार ईश्वर मर चुक...

अनुभव

प्रयोग अथवा परीक्षा द्वारा प्राप्त ज्ञान अनुभव कहलाता है। प्रत्यक्ष ज्ञान अथवा बोध। स्मृति से भिन्न ज्ञान। तर्कसंग्रह के अनुसार ज्ञान के दो भेद हैं - स्मृति ...

अनुभववाद

अनुभववाद एक दार्शनिक सिद्धांत है जिसमें इंद्रियों को ज्ञान का माध्यम माना जाता है और जिसका मनोविज्ञान के संवेदनवाद का विकास अनुभववाद में हुआ। इस वाद के अनुसा...

अन्नपूर्णा उपनिषद

अन्नपूर्णा उपनिषद अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्य...

अन्वयव्यतिरेक

अन्वयव्यतिरेक न्याय के अन्तर्गत सत्य को जानने का एक साधन है। अनुमान में हेतु धुआँ और साध्य आग के संबंध का ज्ञान व्याप्ति आवश्यक है। जब तक धुएँ और आग के साहचर...

अन्विताभिधानवाद

"प्रभाकर मीमांसा" में माना गया है कि अर्थ का ज्ञान केवल शब्द से नहीं, विधिवाक्य से होता है। जो शब्द किसी आज्ञापरक वाक्य में आया हो उसी शब्द की सार्थकता है। व...

अपोनिया

अपोनिया एक यूनानी भाषा का शब्द है जिसका हिन्दी समकक्ष शब्द "हृदयहीनता" या "दर्द रहित" होना होता है। यूनानी दर्शन में प्रचलित एपिक्युरियन मत के अनुसार अपोनिया...

अमृतनादोपनिषद

अमृतनादोपनिषद कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख...

अरब का दर्शन

अरबी दर्शन का विकास चार मंजिलों से होकर गुजरा है: 1 यूनानी ग्रंथों का सामी तथा मुसलमानों द्वारा किया अनुवाद तथा विवेचन, यह युग अनुवादों का है; 2 बुद्धिपरक हे...

अराजकता

अराजकता एक आदर्श है जिसका सिद्धांत अराजकतावाद है। अराजकतावाद राज्य को समाप्त कर व्यक्तियों, समूहों और राष्ट्रों के बीच स्वतंत्और सहज सहयोग द्वारा समस्त मानवी...

अराजकतावाद

अराजकतावाद एक राजनीतिक दर्शन है, जो स्वैच्छिक संस्थानों पर आधारित स्वाभिशासित समाजों की वक़ालत करता है। इनका वर्णन अक्सर राज्यहीन समाजों के रूप में होता है, ...

अवधारणा

अवधारणा या संकल्पना भाषा दर्शन का शब्द है जो संज्ञात्मक विज्ञान, तत्त्वमीमांसा एवं मस्तिष्क के दर्शन से सम्बन्धित है। इसे अर्थ की संज्ञात्मक ईकाई; एक अमूर्त ...

अवधिज्ञान

जैनसंमत आत्ममात्र सापेक्ष प्रत्यक्ष ज्ञान का एक प्रकार अवधिज्ञान है। परमाणपर्यंरूपी पदार्थ इस ज्ञान का विषय है। इसका विपर्यय विभंगज्ञान है। इसकी लब्धि जन्म स...

असंशयवाद

असंशयवाद एक धार्मिक आंदोलन, जो दूसरी सदी के आरंभ में प्रारंभ हुआ, उस सदी के मध्यकाल में अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँचा और फिर क्षीण हो चला। वैसे इसकी विभिन्न शाख...

असद्ख्यातिवाद

-------- माधयमिक शून्यवादियों का भ्रम विचार इस नाम से जाना जाता है। ये ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय की त्रयी को असत कहते हैं यहाँ असत अस्तित्वविहीनता न होकर इस त्रयी...

अस्तित्ववाद

अस्तित्ववाद अस्तित्ववाद मानव केंद्रित दृष्टिकोण हैं अर्थात् वह सम्पूर्ण जगत में मानव को सबसे अधिक प्रदान करता हैं उसकी दृष्टि में मानव एकमात्र साध्य है । प्र...

अहंवाद

अहंवाद उस दार्शनिक सिद्धांत को कहते है जिसके अनुसार केवल ज्ञाता एवं उसकी मनोदशाओं की ही सत्ता है, दूसरी किसी वस्तु की नहीं। दर्शन के इतिहास में अहंवाद के किस...

आंबेडकरवाद

आंबेडकरवाद भीमराव आंबेडकर के आदर्शों, विश्वासों एवं दर्शन से उदभूत विचारों के संग्रह को कहा जाता है, जो भारत के सामाजिक आन्दोलन के सबसे बड़े नेता थे। यह ऐसे ...

आकस्मिकवाद

आकस्मिकवाद दार्शनिक मत ; घटनाओं के अकारण घटित होने का सिद्धांत। यूनान के महान दार्शनिक प्लेटो ने इसका प्रतिपादन किया। सीमाविशेष तक अरस्तू भी इसके समर्थक थे। ...

आजीविक

आजीविक या ‘आजीवक’, दुनिया की प्राचीन दर्शन परंपरा में भारतीय जमीन पर विकसित हुआ पहला नास्तिकवादी या भौतिकवादी सम्प्रदाय था। भारतीय दर्शन और इतिहास के अध्येता...

आत्म ख्यातिवाद

भ्रम सम्बन्धी विचार को ख्याति विचार कहते है। आत्म ख्यातिवाद – योगाचार, विज्ञानवादी, का भ्रम सिद्धांत आत्म ख्यातिवाद कहलाता है। इनके अनुसार विज्ञान ही एकमात्र...

आत्मबोधोपनिषद

आत्मबोधोपनिषद ॠग्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्यत वेदव...

आत्मा

आत्मा या आत्मन् पद भारतीय दर्शन के महत्त्वपूर्ण प्रत्ययों में से एक है। यह उपनिषदों के मूलभूत विषय-वस्तु के रूप में आता है। जहाँ इससे अभिप्राय व्यक्ति में अन...

आत्मोपनिरूषद

आत्मोपनिरूषद अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्यत वेद...

आद्य बिंब

युंग ने उन सामूहिक विचारों को आद्य बिंब आद्य रूप या मूल प्रारूप कहा है जो मनुष्य के प्रजातीय अवचेतन में सृष्टि के आरंभ से अंत तक के संस्कारों की दीर्घ परंपरा...

आधार (तर्क)

तर्कशास्त्र में आधार ऐसा कथन होता है जिसके बारे में यह दावा करा जा रहा हो कि उसकी सच्चाई के फलस्वरूप कोई अन्य निष्कर्ष भी सत्य है। किसी तर्क में आधार के रूप ...

आनंदवाद

आनंदवाद उस विचारधारा का नाम है जिसमें आनंद को ही मानव जीवन का मूल लक्ष्य माना जाता है। विश्व की विचारधारा में आनंदवाद के दो रूप मिलते हैं। प्रथम विचार के अनु...

आन्वीक्षिकी

आन्वीक्षिकी, न्यायशास्त्र का प्राचीन अभिधान। प्राचीन काल में आन्वीक्षिकी, विचारशास्त्र या दर्शन की सामान्य संज्ञा थी और यह त्रयी, वार्ता, दंडनीति के साथ चतुर...

आरूणकोपनिषद

आरूणकोपनिषद सामवेदिय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्यत वेदव्य...

आर्यसत्य

आर्यसत्य की संकल्पना बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत है। इसे संस्कृत में चत्वारि आर्यसत्यानि और पालि में चत्तरि अरियसच्चानि कहते हैं आर्यसत्य चार हैं- 1 दुःख: सं...

आशावाद

आशावाद उस मानसिक स्थिति को कहते हैं जिसमें व्यक्ति सर्वोत्तम फल के प्रति आशान्वित हो। दार्शनिक रूप से यह निराशावाद का विलोम है। आशावादियों में प्राय: यह प्रब...

आस्तिक दर्शन

आस्तिक दर्शन भारतीय दर्शन परम्परा में उन दर्शनों को कहा जाता है जो वेदों को प्रमाण मानते थे। भारत में भी कुछ ऐसे व्यक्तियों ने जन्म लिया जो वैदिक परम्परा के ...

आस्तिकता

हिन्दू धर्म में ईश्वर, इहलोक, व्यक्त, राज्ञा, के अस्तित्व में, विशेषत: ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास का नाम आस्तिकता है। पाश्चात्य दर्शन में ईश्वर के अस्तित्...

ईशावास्य उपनिषद्

ईशोपनिषद् शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद् अपने नन्हें कलेवर के कारण अन्य उपनिषदों के बीच बेहद महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसमें को...

उद्देश्यवाद

उद्देश्यवाद के अनुसार प्रत्येक कार्य या रचना में कोई उद्देश्य, प्रयोजन या अंतिम कारण निहित रहता है जो उसके संपादनार्थ प्रेरणा प्रदान किया करता है। इसे प्रयोज...

उपदेशवाद

साहित्य के माध्यम से उपदेश देने की प्रवृत्ति को उपदेशवाद की संज्ञा दी गई है। अंग्रेजी में इससे संबद्ध पर्याप्त साहित्य मिलता है, लेकिन हिंदी के नीतिकाव्य को ...

उपनिषद्

उपनिषद् हिन्दू धर्म के महत्त्वपूर्ण श्रुति धर्मग्रन्थ हैं। ये वैदिक वाङ्मय के अभिन्न भाग हैं। ये संस्कृत में लिखे गये हैं। इनकी संख्या लगभग २०० है, किन्तु मु...

उपपत्ति

प्रकरण से प्रतिपादित अर्थ के साधन में जो युक्ति प्रस्तुत की जाती है उसे उपपत्ति कहते हैं- प्रकरण प्रतिपाद्यार्थसाधने तत्र तत्र श्रूयमाणा युक्तिः उपपत्तिः। ज्...

उपमान

दर्शन में किसी अज्ञात वस्तु को किसी ज्ञात वस्तु की समानता के आधापर किसी नाम से जानना उपमान कहलाता है। जैसे किसी को मालूम है कि नीलगाय, गाय जैसी होती है; कभी ...

उपयोगितावाद

उपयोगितावाद एक आचार सिद्धांत है जिसकी एकांतिक मान्यता है कि आचरण एकमात्र तभी नैतिक है जब वह अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख की अभिवृद्धि करता है। राजनीतिक तथ...

ऋषभदेव

भगवान ऋषभदेव जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं। तीर्थंकर का अर्थ होता है जो तीर्थ की रचना करें। जो संसार सागर से मोक्ष तक के तीर्थ की रचना करें, वह तीर्थंकर कहल...

एकात्म मानववाद (भारत)

एकात्म मानववाद मानव जीवन व सम्पूर्ण सृष्टि के एकमात्र सम्बन्ध का दर्शन है। इसका वैज्ञानिक विवेचन पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने किया था। एकात्म मानववाद, राष्ट्रीय...

ऐतिहासिक भौतिकवाद

ऐतिहासिक भौतिकवाद समाज और उसके इतिहास के अध्ययन में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के सिद्धांतों का प्रसारण है। आधुनिक काल में चूँकि इतिहास को मात्र विवरणात्मक न मानक...

कठ उपनिषद्

कठ उपनिषद् या कठोपनिषद, एक कृष्ण यजुर्वेदीय उपनिषद है। कठोपनिषद कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचि...

कठरूद्रोपनिषद

कठरूद्रोपनिषद कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख...

कन्फ़्यूशियस

कंफ्यूशियसी दर्शन की शुरुआत 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व चीन में हुई। जिस समय भारत में भगवान महावीऔर बुद्ध धर्म के संबध में नए विचार रख रहें थे, चीन में भी एक महात...