उपनिषद्

उपनिषद् हिन्दू धर्म के महत्त्वपूर्ण श्रुति धर्मग्रन्थ हैं। ये वैदिक वाङ्मय के अभिन्न भाग हैं। ये संस्कृत में लिखे गये हैं। इनकी संख्या लगभग २०० है, किन्तु मुख्य उपनिषद १३ हैं। हरेक उपनिषद किसी न किसी वेद से जुड़ा हुआ है। इनमें परमेश्वर, परमात्मा-ब्रह्म और आत्मा के स्वभाव और सम्बन्ध का बहुत ही दार्शनिक और ज्ञानपूर्वक वर्णन दिया गया है।
उपनिषदों में कर्मकाण्ड को अवर कहकर ज्ञान को इसलिए महत्व दिया गया कि ज्ञान स्थूल जगत और पदार्थ से सूक्ष्म मन और आत्मा की ओर ले जाता है। ब्रह्म, जीव और जगत्‌ का ज्ञान पाना उपनिषदों की मूल शिक्षा है। भगवद्गीता तथा ब्रह्मसूत्र, उपनिषदों के साथ मिलकर वेदान्त की प्रस्थानत्रयी कहलाते हैं। ब्रह्मसूत्और गीता कुछ सीमा तक उपनिषदों पर आधारित हैं। भारत की समग्र दार्शनिक चिन्तनधारा का मूल स्रोत उपनिषद-साहित्य ही है। इनसे दर्शन की जो विभिन्न धाराएं निकली हैं, उनमें वेदान्त दर्शन का अद्वैत सम्प्रदाय प्रमुख है। उपनिषदों के तत्त्वज्ञान और कर्तव्यशास्त्र का प्रभाव भारतीय दर्शन के अतिरिक्त धर्म और संस्कृति पर भी परिलक्षित होता है। उपनिषदों का महत्त्व उनकी रोचक प्रतिपादन शैली के कारण भी है। कर्इ सुन्दर आख्यान और रूपक, उपनिषदों में मिलते हैं।
उपनिषद् भारतीय सभ्यता की अमूल्य धरोहर है। उपनिषद ही समस्त भारतीय दर्शनों के मूल स्रोत हैं, चाहे वो वेदान्त हो या सांख्य। उपनिषदों को स्वयं भी वेदान्त कहा गया है। १७वीं सदी में दारा शिकोह ने अनेक उपनिषदों का फारसी में अनुवाद कराया। १९वीं सदी में जर्मन तत्त्ववेता शोपेनहावर और मैक्समूलर ने इन ग्रन्थों में जो रुचि दिखलाकर इनके अनुवाद किए वह सर्वविदित हैं और माननीय हैं। विश्व के कई दार्शनिक उपनिषदों को सबसे बेहतरीन ज्ञानकोश मानते हैं।
उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक चिंतन के मूल आधार हैं, भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के स्रोत हैं। वे ब्रह्मविद्या हैं। जिज्ञासाओं के ऋषियों द्वारा खोजे हुए उत्तर हैं। वे चिन्तनशील ऋषियों की ज्ञानचर्चाओं का सार हैं। वे कवि-हृदय ऋषियों की काव्यमय आध्यात्मिक रचनाएं हैं, अज्ञात की खोज के प्रयास हैं, वर्णनातीत परमशक्ति को शब्दों में बांधने की कोशिशें हैं और उस निराकार, निर्विकार, असीम, अपार को अन्तरदृष्टि से समझने और परिभाषित करने की अदम्य आकांक्षा के लेखबद्ध विवरण हैं।

1. उपनिषद शब्द का अर्थ
उपनिषद् शब्द का साधारण अर्थ है - ‘समीप उपवेशन’ या समीप बैठना ब्रह्म विद्या की प्राप्ति के लिए शिष्य का गुरु के पास बैठना। यह शब्द ‘उप’, ‘नि’ उपसर्ग तथा, ‘सद्’ धातु से निष्पन्न हुआ है। सद् धातु के तीन अर्थ हैं: विवरण-नाश होना; गति-पाना या जानना तथा अवसादन-शिथिल होना। उपनिषद् में ऋषि और शिष्य के बीच बहुत सुन्दर और गूढ संवाद है जो पाठक को वेद के मर्म तक पहुंचाता है।और

2. विषय-वस्तु
उपनिषदों में मुख्य रूप से आत्मविद्या का प्रतिपादन है, जिसके अन्तर्गत ब्रह्म और आत्मा के स्वरूप, उसकी प्राप्ति के साधन और आवश्यकता की समीक्षा की गयी है। आत्मज्ञानी के स्वरूप, मोक्ष के स्वरूप आदि अवान्तर विषयों के साथ ही विद्या, अविद्या, श्रेयस, प्रेयस, आचार्य आदि तत्सम्बद्ध विषयों पर भी भरपूर चिन्तन उपनिषदों में उपलब्ध होता है। वैदिक ग्रन्थों में जो दार्शनिक और आध्यात्मिक चिन्तन यत्र-तत्र दिखार्इ देता है, वही परिपक्व रूप में उपनिषदों में निबद्ध हुआ है।
उपनिषदों में सर्वत्र समन्वय की भावना है। दोनों पक्षों में जो ग्राह्य है, उसे ले लेना चाहिए। इसी दृष्टि से ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग, विद्या और अविद्या, संभूति और असंभूति के समन्वय का उपदेश है। उपनिषदों में कभी-कभी ब्रह्मविद्या की तुलना में कर्मकाण्ड को बहुत हीन बताया गया है। र्इश आदि कर्इ उपनिषदें एकात्मवाद का प्रबल समर्थन करती हैं।
उपनिषद् ब्रह्मविद्या का द्योतक है। कहते हैं इस विद्या के अभ्यास से मुमुक्षुजन की अविद्या नष्ट हो जाती है विवरण; वह ब्रह्म की प्राप्ति करा देती है गति; जिससे मनुष्यों के गर्भवास आदि सांसारिक दुःख सर्वथा शिथिल हो जाते हैं अवसादन। फलतः उपनिषद् वे ‘तत्त्व’ प्रतिपादक ग्रन्थ माने जाते हैं जिनके अभ्यास से मनुष्य को ब्रह्म अथवा परमात्मा का साक्षात्कार होता है।

2.1. विषय-वस्तु उपनिषदों की कथाएँ
उपनिषदों में देवता-दानव, ऋषि-मुनि, पशु-पक्षी, पृथ्वी, प्रकृति, चर-अचर, सभी को माध्यम बना कर रोचक और प्रेरणादायक कथाओं की रचना की गयी है। इन कथाओं की रचना वेदों की व्याख्या के उद्देश्य से की गई। जो बातें वेदों में जटिलता से कही गयी है उन्हें उपनिषदों में सरल ढंग से समझाया गया है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, अग्नि, सूर्य, इन्द्र आदि देवताओं से लेकर नदी, समुद्र, पर्वत, वृक्ष तक उपनिषद के कथापात्र है।
उपनिषद् गुरु-शिष्य परम्परा के आदर्श उदाहरण हैं। प्रश्नोत्तर के माध्यम से सृष्टि के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन उपनिषदों में सहज ढंग से किया गया है। विभिन्न दृष्टान्तों, उदाहरणों, रूपकों, संकेतों और युक्तियों द्वारा आत्मा, परमात्मा, ब्रह्म आदि का स्पष्टीकरण इतनी सफलता से उपनिषद् ही कर सके हैं।
प्रमुख कथाएँ-
रजि की कथा, कार्तवीर्य की कथा, नचिकेता की कथा, उद्दालक और श्वेतकेतु की कथा, सत्यकाम जाबाल की कथा आदि।

3. आध्यात्मिक चिन्तन की अमूल्य निधि
उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक चिंतन के मूलाधार है, भारतीय आध्यात्मिक दर्शन स्रोत हैं। वे ब्रह्मविद्या हैं। जिज्ञासाओं के ऋषियों द्वारा खोजे हुए उत्तर हैं। वे चिंतनशील ऋषियों की ज्ञानचर्चाओं का सार हैं। वे कवि-हृदय ऋषियों की काव्यमय आध्यात्मिक रचनाएँ हैं, अज्ञात की खोज के प्रयास हैं, वर्णनातीत परमशक्ति को शब्दों में बाँधने की कोशिशें हैं और उस निराकार, निर्विकार, असीम, अपार को अंतर्दृष्टि से समझने और परिभाषित करने की अदम्य आकांक्षा के लेखबद्ध विवरण हैं।

4. उपनिषदकाल के पहले: वैदिक युग
वैदिक युग सांसारिक आनन्द एवं उपभोग का युग था। मानव मन की निश्चिंतता, पवित्रता, भावुकता, भोलेपन व निष्पापता का युग था। जीवन को संपूर्ण अल्हड़पन से जीना ही उस काल के लोगों का प्रेय व श्रेय था। प्रकृति के विभिन्न मनोहारी स्वरूपों को देखकर उस समय के लोगों के भावुक मनों में जो उद्‍गार स्वयंस्फूर्त आलोकित तरंगों के रूप में उभरे उन मनोभावों को उन्होंने प्रशस्तियों, स्तुतियों, दिव्यगानों व काव्य रचनाओं के रूप में शब्दबद्ध किया और वे वैदिक ऋचाएँ या मंत्र बन गए। उन लोगों के मन सांसारिक आनंद से भरे थे, संपन्नता से संतुष्ट थे, प्राकृतिक दिव्यताओं से भाव-विभोर हो उठते थे। अत: उनके गीतों में यह कामना है कि यह आनंद सदा बना रहे, बढ़ता रहे और कभी समाप्त न हो। उन्होंने कामना की कि इस आनंद को हम पूर्ण आयु सौ वर्षों तक भोगें और हमारे बाद की पीढियाँ भी इसी प्रकार तृप्त रहें। यही नहीं कामना यह भी की गई कि इस जीवन के समाप्त होने पर हम स्वर्ग में जाएँ और इस सुख व आनंद की निरंतरता वहाँ भी बनी रहे। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न अनुष्ठान भी किगए और देवताओं को प्रसन्न करने के आयोजन करके उनसे ये वरदान भी माँगे गए। जब प्रकृति करवट लेती थी तो प्राकृतिक विपदाओं का सामना होता था। तब उन विपत्तियों केकाल्पनिक नियंत्रक देवताओं यथा मरुत, अग्नि, रुद्र आदि को तुष्ट व प्रसन्न करने के अनुष्ठान किए जाते थे और उनसे प्रार्थना की जाती थी कि ऐसी विपत्तियों को आने न दें और उनके आने पर प्रजा की रक्षा करें। कुल मिलाकर वैदिक काल के लोगों का जीवन प्रफुल्लित, आह्लादमय, सुखाकांक्षी, आशावादी और‍ जिजीविषापूर्ण था। उनमें विषाद, पाप या कष्टमय जीवन के विचार की छाया नहीं थी। नरक व उसमें मिलने वाली यातनाओं की कल्पना तक नहीं की गई थी। कर्म को यज्ञ और यज्ञ को ही कर्म माना गया था और उसी के सभी सुखों की प्राप्ति तथा संकटों का निवारण हो जाने की अवधारणा थी। यह जीवनशैली दीर्घकाल तक चली। पर ऐसा कब तक चलता। एक न एक दिन तो मनुष्य के अनंत जिज्ञासु मस्तिष्क में और वर्तमान से कभी संतुष्ट न होने वाले मन में यह जिज्ञासा, यह प्रश्न उठना ही था कि प्रकृति की इस विशाल रंगभूमि के पीछे सूत्रधार कौन है, इसका सृष्टा/निर्माता कौन है, इसका उद्‍गम कहाँ है, हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं, यह सृष्टि अंतत: कहाँ जाएगी। हमारा क्या होगा? शनै:-शनै: ये प्रश्न अंकुरित हुए। और फिर शुरू हुई इन सबके उत्तर खोजने की ललक तथा जिज्ञासु मन-मस्तिष्क की अनंत खोज यात्रा। कुछ लोगों की जीवन देखने की क्षमता गहरी होने लगी, जिसकी वजह से उनको जीवन चक्र दिखने लगा। जीवन में सुख और दुख दोनों है ये दिखने लगा। कुछ लोगों को ये लगने लगा कि जीवन क्या सिर्फ यही है। उन्होंने ना कहना शुरू किया पेट केंद्रित जीवन को। इसी "ना" से उपनिषद की शुरुआत हुई।

5. उपनिषदकालीन विचारों का उदय
ऐसा नहीं है कि आत्मा, पुनर्जन्म और कर्मफलवाद के विषय में वैदिक ऋषियों ने कभी सोचा ही नहीं था। ऐसा भी नहीं था कि इस जीवन के बारे में उनका कोई ध्यान था। ऋषियों ने यदा-कदा इस विषय पर विचार किया भी था। इसके बीज वेदों में यत्र-तत्र मिलते हैं, परंतु यह केवल विचार मात्र था। कोई चिंता या भय नहीं। आत्मा शरीर से भिन्न तत्व है और इस जीवन की समाप्ति के बाद वह परलोक को जाती है इस सिद्धांत का आभास वैदिक ऋचाओं में मिलता अवश्य है परंतु संसार में आत्मा का आवागमन क्यों होता है, इसकी खोज में वैदिक ऋषि प्रवृत्त नहीं हुए। अपनी समस्त सीमाओं के साथ सांसारिक जीवन वैदिक ऋषियों का प्रेय था। प्रेय को छोड़कर श्रेय की ओर बढ़ने की आतुरता उपनिषदों के समय जगी, तब मोक्ष के सामने ग्रहस्थ जीवन निस्सार हो गया एवं जब लोग जीवन से आनंद लेने के बजाय उससे पीठ फेरकर संन्यास लेने लगे। हाँ, यह भी हुआ कि वैदिक ऋषि जहाँ यह पूछ कर शांत हो जाते थे कि यह सृष्टि किसने बनाई है? और कौन देवता है जिसकी हम उपासना करें? वहाँ उपनिषदों के ऋषियों ने सृष्टि बनाने वाले के संबंध में कुछ सिद्धांतों का निश्चय कर दिया और उस सत का भी पता पा लिया जो पूजा और उपासना का वस्तुत: अधिकार है। वैदिक धर्म का पुराना आख्यान वेद और नवीन आख्यान उपनिषद हैं।वेदों में यज्ञ-धर्म का प्रतिपादन किया गया और लोगों को यह सीख दी गई कि इस जीवन में सुखी, संपन्न तथा सर्वत्र सफल व विजयी रहने के लिए आवश्यक है कि देवताओं की तुष्टि व प्रसन्नता के लिए यज्ञ किए जाएँ। विश्व की उत्पत्ति का स्थान यज्ञ है। सभी कर्मों में श्रेष्ठ कर्म यज्ञ है। यज्ञ के कर्मफल से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ये ही सूत्र चारों ओर गुँजित थे। दूसरे, जब ब्राह्मण ग्रंथों ने यज्ञ को बहुत अधिक महत्व दे दिया और पुरोहितवाद तथा पुरोहितों की मनमानी अत्यधिक बढ़ गई तब इस व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिक्रिया हुई और विरोध की भावना का सूत्रपात हुआ। लोग सोचने लगे कि यज्ञों का वास्तविक अर्थ क्या है? उनके भीतर कौन सा रहस्य है? वे धर्म के किस रूप के प्रतीक हैं? क्या वे हमें जीवन के चरम लक्ष्य तक पहुँचा देंगे? इस प्रकार, कर्मकाण्ड पर बहुत अधिक जोर तथा कर्मकाण्डों को ही जीवन की सभी समस्याओं के हल के रूप में प्रतिपादित किए जाने की प्रवृत्ति ने विचारवान लोगों को उनके बारे में पुनर्विचार करने को प्रेरित किया। प्रकृति के प्रत्येक रूप में एक नियंत्रक देवता की कल्पना करते-करते वैदिक आर्य बहुदेववादी हो गए थे। उनके देवताओं में उल्लेखनीय हैं- इंद्र, वरुण, अग्नि, सविता, सोम, अश्विनीकुमार, मरुत, पूषन, मित्र, पितर, यम आदि। तब एक बौद्धिक व्यग्रता प्रारंभ हुई उस एक परमशक्ति के दर्शन करने या उसके वास्तविक स्वरूप को समझने की कि जो संपूर्ण सृष्टि का रचयिता और इन देवताओं के ऊपर की सत्ता है। इस व्यग्रता ने उपनिषद के चिंतनों का मार्ग प्रशस्त किया।

6. उपनिषदों का स्वरूप
उपनिषद चिंतनशील एवं कल्पाशील मनीषियों की दार्शनिक काव्य रचनाएँ हैं। जहाँ गद्य लिख गए हैं वे भी पद्यमय गद्य-रचनाओं में ऐसी शब्द-शक्ति, ध्वन्यात्मकता, लव एवं अर्थगर्भिता है कि वे किसी दैवी शक्ति की रचनाओं का आभास देते हैं। यह सचमुच अत्युक्ति नहीं है कि उन्हें मंत्र या ऋचा कहा गया। वास्तव में मंत्र या ऋचा का संबंध वेद से है परंतु उपनिषदों की हमत्ता दर्शाने के लिए इन संज्ञाओं का उपयोग यहाँ भी कतिपय विद्वानों द्वारा किया जाता है। उपनिषद अपने आसपास के दृश्य संसार के पीछे झाँकने के प्रयत्न हैं। इसके लिए न कोई उपकरण उपलब्ध हैं और न किसी प्रकार की प्रयोग-अनुसंधान सुविधाएँ संभव है। अपनी मनश्चेतना, मानसिक अनुभूति या अंतर्दृष्टि के आधापर हुए आध्यात्मिक स्फुरण या दिव्य प्रकाश को ही वर्णन का आधार बनाया गया है। उपनिषद अध्यात्मविद्या के विविध अध्याय हैं जो विभिन्न अंत:प्रेरित ऋषियों द्वारा लिखे गए हैं। इनमें विश्व की परमसत्ता के स्वरूप, उसके अवस्थान, विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों के साथ उसके संबंध, मानवीय आत्मा में उसकी एक किरण की झलक या सूक्ष्म प्रतिबिंब की उपस्थिति आदि को विभिन्न रूपकों और प्रतीकों के रूप में वर्णित किया गया है। सृष्टि के उद्‍गम एवं उसकी रचना के संबंध में गहन चिंतन तथा स्वयंफूर्त कल्पना से उपजे रूपांकन को विविध बिंबों और प्रतीकों के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया है। अंत में कहा यह गया कि हमारी श्रेष्ठ परिकल्पना के आधापर जो कुछ हम समझ सके, वह यह है। इसके आगे इस रहस्य को शायद परमात्मा ही जानता हो और शायद वह भी नहीं जानता हो।
संक्षेप में, वेदों में इस संसार में दृश्यमान एवं प्रकट प्राकृतिक शक्तियों के स्वरूप को समझने, उन्हें अपनी कल्पनानुसार विभिन्न देवताओं का जामा पहनाकर उनकी आराधना करने, उन्हें तुष्ट करने तथा उनसे सांसारिक सफलता व संपन्नता एवं सुरक्षा पाने के प्रयत्न किगए थे। उन तक अपनी श्रद्धा को पहुँचाने का माध्यम यज्ञों को बनाया गया था। उपनिषदों में उन अनेक प्रयत्नों का विवरण है जो इन प्राकृतिक शक्तियों के पीछे की परमशक्ति या सृष्टि की सर्वोच्च सत्ता से साक्षात्कार करने की मनोकामना के साथ किए गए। मानवीय कल्पना, चिंतन-क्षमता, अंतर्दृष्टि की क्षमता जहाँ तक उस समय के दार्शनिकों, मनीषियों या ऋषियों को पहुँचा सकीं उन्होंने पहुँचने का भरसक प्रयत्न किया। यही उनका तप था।

7.1. उपनिषदों का वर्गीकरण वेद से सम्बन्ध
वैदिक संहिताओं के अनन्तर वेद के तीन प्रकार के ग्रन्थ हैं- ब्राह्राण, आरण्यक और उपनिषद। इन ग्रन्थों का सीधा सम्बन्ध अपने वेद से होता है, जैसे ऋग्वेद के ब्राह्राण, ऋग्वेद के आरण्यक और ऋग्वेद के उपनिषदों के साथ ऋग्वेद का संहिता ग्रन्थ मिलकर भारतीय परम्परा के अनुसार ऋग्वेद कहलाता है।
किसी उपनिषद का सम्बन्ध किस वेद से है, इस आधापर उपनिषदों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जाता है-
१ ऋग्वेदीय -- १० उपनिषद्
२ शुक्ल यजुर्वेदीय -- १९ उपनिषद्
३ कृष्ण यजुर्वेदीय -- ३२ उपनिषद्
४ सामवेदीय -- १६ उपनिषद्
५ अथर्ववेदीय -- ३१ उपनिषद्
कुल -- १०८ उपनिषद्
इनके अतिरिक्त नारायण, नृसिंह, रामतापनी तथा गोपाल चार उपनिषद् और हैं।

7.2. उपनिषदों का वर्गीकरण मुख्य उपनिषद एवं गौण उपनिषद
विषय की गम्भीरता तथा विवेचन की विशदता के कारण १३ उपनिषद् विशेष मान्य तथा प्राचीन माने जाते हैं।
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने १० पर अपना भाष्य दिया है- १ ईश, २ ऐतरेय ३ कठ ४ केन ५ छान्दोग्य ६ प्रश्न ७ तैत्तिरीय ८ बृहदारण्यक ९ मांडूक्य और १० मुण्डक।
उन्होने निम्न तीन को प्रमाण कोटि में रखा है- १ श्वेताश्वतर २ कौषीतकि तथा ३ मैत्रायणी।
अन्य उपनिषद् तत्तद् देवता विषयक होने के कारण तांत्रिक माने जाते हैं। ऐसे उपनिषदों में शैव, शाक्त, वैष्णव तथा योग विषयक उपनिषदों की प्रधान गणना है।

7.3. उपनिषदों का वर्गीकरण प्रतिपाद्य विषय के आधापर
डॉ॰ ड्यूसेन, डॉ॰ बेल्वेकर तथा रानडे ने उपनिषदों का विभाजन प्रतिपाद्य विषय की दृष्टि से इस प्रकार किया है:
१. गद्यात्मक उपनिषद्
१. ऐतरेय, २. केन, ३. छान्दोग्य, ४. तैत्तिरीय, ५. बृहदारण्यक तथा ६. कौषीतकि; इनका गद्य ब्राह्मणों के गद्य के समान सरल, लघुकाय तथा प्राचीन है।
२.पद्यात्मक उपनिषद्
१.ईश, २.कठ, ३. श्वेताश्वतर तथा नारायण इनका पद्य वैदिक मंत्रों के अनुरूप सरल, प्राचीन तथा सुबोध है।
३.अवान्तर गद्योपनिषद्
१.प्रश्न, २.मैत्री मैत्रायणी तथा ३.माण्डूक्य
४.आथर्वण अर्थात् कर्मकाण्डी उपनिषद्
अन्य अवांतरकालीन उपनिषदों की गणना इस श्रेणी में की जाती है।

7.4. उपनिषदों का वर्गीकरण भाषा तथा उपनिषदों के विकासक्रम के आधापर
भाषा तथा उपनिषदों के विकास क्रम की दृष्टि से डॉ॰ डासन ने उनका विभाजन चार स्तर में किया है:
प्राचीनतम
१. ईश, २. ऐतरेय, ३. छान्दोग्य, ४. प्रश्न, ५. तैत्तिरीय, ६. बृहदारण्यक, ७. माण्डूक्य और ८. मुण्डक
प्राचीन
१. कठ, २. केन
अवान्तरकालीन
१. कौषीतकि, २. मैत्री मैत्राणयी तथा ३. श्वेताश्वतर

8. उपनिषदों की भौगोलिक स्थिति एवं काल
उपनिषदों की भौगोलिक स्थिति मध्यदेश के कुरुपांचाल से लेकर विदेह मिथिला तक फैली हुई है। उपनिषदों के काल के विषय मे निश्चिमत नही है पर उपनिषदो का काल ३००० ईसा पूर्व से ३५०० ई पू माना गया है। वेदो का रचना काल भी यही समय माना गया है। उपनिषद् काल का आरम्भ बुद्ध से पर्याप्त पूर्व है। "ग्रेट एजेज ऑफ मैन" के सम्पादक इसे लगभग ८०० ई.पू. बतलाते हैं।
उपनिषदों के रचनाकाल के सम्बन्ध में विद्वानों का एक मत नहीं है। कुछ उपनिषदों को वेदों की मूल संहिताओं का अंश माना गया है। ये सर्वाधिक प्राचीन हैं। कुछ उपनिषद ‘ब्राह्मण’ और ‘आरण्यक’ ग्रन्थों के अंश माने गये हैं। इनका रचनाकाल संहिताओं के बाद का है। उपनिषदों के काल के विषय मे निश्चिमत नही है समान्यत उपनिषदो का काल रचनाकाल ३००० ईसा पूर्व से ५०० ईसा पूर्व माना गया है। उपनिषदों के काल-निर्णय के लिए निम्न मुख्य तथ्यों को आधार माना गया है -
पुरातत्व एवं भौगोलिक परिस्थितियां
पौराणिक अथवा वैदिक ॠषियों के नाम
सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी राजाओं के समयकाल
उपनिषदों में वर्णित खगोलीय विवरण
निम्न विद्वानों द्वारा विभिन्न उपनिषदों का रचना काल निम्न क्रम में माना गया है-

  • ज गल म ल ख गय उपन षद ह इसम तत त वज ञ न और तद पय ग कर म तथ उप सन ओ क बड ह स न दर वर णन ह ब हद रण यक उपन षद अद व त व द त और स न य सन ष ठ
  • ईश पन षद श क ल यज र व द य श ख क अन तर गत एक उपन षद ह यह उपन षद अपन नन ह कल वर क क रण अन य उपन षद क ब च ब हद महत त वप र ण स थ न रखत ह इसम
  • उपन षद क अन य अर थ उप सम प न षत - न ष दत - ब ठन व ल अर थ त - ज उस परम तत व क सम प ब ठत ह उपन षद यत - प र प यत ब रह म त मभ व ऽनय इत उपन षद
  • श क ष वल ल क स ह त उपन षद एव ब रह म न दवल ल और भ ग वल ल क वर ण क प रवर तक ह न स व र ण उपन षद य व द य भ कहत ह त त तर य उपन षद क ष ण यज र व द य
  • कठ उपन षद य कठ पन षद, एक क ष ण यज र व द य उपन षद ह कठ पन षद क ष ण यज र व द य श ख क अन तर गत एक उपन षद ह यह उपन षद स स क त भ ष म ल ख त ह इसक
  • ऐतर य उपन षद एक श क ल ऋग व द य उपन षद ह ऋग व द य ऐतर य आरण यक क अन तर गत द व त य आरण यक क अध य य 4, 5 और 6. क न म ऐतर य पन षद ह यह उपन षद ब रह मव द य प रध न
  • ब हद रण यक पन षद श व त श वतर पन षद क श तक उपन षद म त र यण उपन षद आद श कर च र य न इनम स उपन षद पर ट क ल ख थ इनम म ण ड क य पन षद सबस
  • म त र यण उपन षद स मव द य श ख क एक स न य सम र ग उपन षद ह ऐक ष व क ब हद रथ न व रक त ह अपन ज य ष ठ प त र क र ज य द कर वन म घ र तपस य करन
  • ह - ज ग रत, स वप न, स ष प त और त र य प रथम दस उपन षद म सम व ष ट क वल ब रह म त र क यह उपन षद उनम आक र क द ष ट स सब स छ ट ह क त महत व
  • श व त श वतर उपन षद ज ईश द दस प रध न उपन षद क अन तर एक दश एव श ष उपन षद म अग रण ह क ष ण यज र व द क अ ग ह छह अध य य और 113 म त र क इस उपन षद क
  • ध य नब न द उपन षद क ष ण यज र व द य श ख क अन तर गत एक उपन षद ह यह उपन षद स स क त भ ष म ल ख त ह इसक रच यत व द क क ल क ऋष य क म न ज त ह
  • गणपत उपन षद अथर वव द य श ख क अन तर गत एक उपन षद ह यह उपन षद स स क त भ ष म ल ख त ह इसक रच यत व द क क ल क ऋष य क म न ज त ह परन त म ख यत
  • स त उपन षद अथर वव द य श ख क अन तर गत एक उपन षद ह यह उपन षद स स क त भ ष म ल ख त ह इसक रच यत व द क क ल क ऋष य क म न ज त ह परन त म ख यत
  • दक ष ण म र त उपन षद क ष ण यज र व द य श ख क अन तर गत एक उपन षद ह यह उपन षद स स क त भ ष म ल ख त ह इसक रच यत व द क क ल क ऋष य क म न ज त
  • अक ष उपन षद क ष ण यज र व द य श ख क अन तर गत एक उपन षद ह यह उपन षद स स क त भ ष म ल ख त ह इसक रच यत व द क क ल क ऋष य क म न ज त ह परन त
  • अथर वश र उपन षद अथर वव द य श ख क अन तर गत एक उपन षद ह यह उपन षद स स क त भ ष म ल ख त ह इसक रच यत व द क क ल क ऋष य क म न ज त ह परन त म ख यत
  • अन तर गत एक उपन षद ह यह उपन षद स स क त भ ष म ल ख त ह इसक रच यत व द क क ल क ऋष य क म न ज त ह परन त म ख यत व दव य स ज क कई उपन षद क ल खक
  • अन तर गत एक उपन षद ह यह उपन षद स स क त भ ष म ल ख त ह इसक रच यत व द क क ल क ऋष य क म न ज त ह परन त म ख यत व दव य स ज क कई उपन षद क ल खक
  • ब रह म त म क य इस उपन षद क स द ध त न ष पन न ह त ह उपन षद क रचन क ल क सम बन ध म व द व न क एक मत नह ह क छ उपन षद क व द क म ल स ह त ओ
  • क ष तक उपन षद क प र न म ह यह एक ऋग व द य उपन षद ह क ष तक उपन षद ॠग व द क क ष तक ब र ह मण क अ श ह इसम क ल च र अध य य ह इस उपन षद म ज व त म
  • स न य स उपन षद व उपन षद ह ज स न य स स सम बन ध त ह म क त क उपन षद म वर ण त उपन षद म स उपन षद सन य स उपन षद क श र ण म ह
  • Upanishad Sanskrit text with English Translation उपन षद न आत मन र क षण क म र ग बत य य गच ड मण उपन षद स स क त व क स र त य गच ड मण य पन षत स स क त
  • उपन षद क ल खक म न ज त ह स उपन षद क प रवक त आच र य प प पल द थ ज कद च त प पल क ग द ख कर ज त थ उपन षद क रचन क ल क सम बन ध म व द व न
  • छ द ग य उपन षद स मव द य छ न द ग य ब र ह मण क औपन षद क भ ग ह ज प र च नतम दस उपन षद म नवम एव सबस ब हद क र ह इसक आठ प रप ठक म प रत य क
  • म क त क एक उपन षद ह ज सम उपन षद क स च द गय ह क स भ उपन षद क रचन क ल ठ क - ठ क पत नह ह सब स प र न उपन षद क रचन ईस स लगभग
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उपनिषद्: सर्वे भवन्तु सुखिनः कहाँ से लिया गया है, सर्वे भवन्तु सुखिनः किस उपनिषद से लिया गया है, सर्वे भवन्तु सुखिनः किस ग्रन्थ से है, सर्वे भवन्तु सुखिनः गरुड़ पुराण, सर्वे भवन्तु सुखिनः किस प्रकार का वाक्य है, सर्वे भवन्तु सुखिनः उपनिषद, सर्वे भवन्तु सुखिनः निबंध इन हिंदी, सर्वे भवन्तु सुखिनः पर निबंध

सर्वे भवन्तु सुखिनः किस ग्रन्थ से है.

Geeta upnishad Rahul gandhi NewsroomPost. लेखक प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं कि 1000 800 ईसापूर्व के बीच उपनिषद वेदांत के रूप में सामने आए। वे यह भी बता रहे हैं कि कैसे ज्ञान के धरातल पर उपनिषदों ने वेदों को पछाड़ा। साथ ही यह भी कि उपनिषदों में वर्ण व्यवस्था पर बहुत जोर नहीं. सर्वे भवन्तु सुखिनः किस प्रकार का वाक्य है. अनटाइटल्ड Webstock. Paean Kumar. 3 years ago. महाकाव्य 2,वेद 4,वेदांत 6,पुराण 18 और उपनिषद् 108. 132 लाइक. RINKA KUMAR CHOUDHARY. 3 years ago. One hundred eight. 10 लाइक. kamal kant saraswat. 3 years ago. 108 upnishad. 10 लाइक. sandeep. 3 years ago. उपनिषद 108. 17 लाइक. virendra saroj. 3 years ago. सर्वे भवन्तु सुखिनः किस उपनिषद से लिया गया है. उपनिषद् में आपको जीवन से बचने या जीवन पाप है या. परिभाषा मुख्य उपनिषदों में से एक वाक्य में प्रयोग प्रश्न उपनिषद् अथर्ववेद से संबंधित है । समानार्थी शब्द प्रश्न उपनिषद, प्रश्नोपनिषद्, प्रश्नोपनिषद, प्रश्न लिंग अज्ञात एक तरह का उपनिषद्. Hindi Shabdamitra Copyright © 2017, Developed by Center. सर्वे भवन्तु सुखिनः कहाँ से लिया गया है. Devasthan Department, Rajasthan. उपनिषद् काल में अध्यात्म सम्बन्धी उदात्त चिन्तन के पीछे गुरु के दायित्व का बोध उद्भासित होता है, क्योंकि उन्होंने ही बताया है सर्वं खल्विदं ब्रह्म सबका प्रादूर्भाव परब्रह्म से ही हुआ है। उससे भिन्न कुछ भी नहीं है, इसलिए किसी से.

मातृ भाषा से प्रेम छत्तीसगढ़ी में लिखा उपनिषद्.

वृहदारण्यक उपनिषद् की मैत्रेयी सौभाग्यशाली. 9 years ago प्रवक्‍ता ब्यूरो. – हृदयनारायण दीक्षित. वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल में ढेर सारी तत्ववेत्ता महिलाएं हैं। लोपामुद्रा ऋग्वेद की मंत्रद्रष्टा हैं लेकिन मैत्रेयी की तत्व अभीप्सा​. वेदों के विषय में संक्षिप्त विवरण ब्राह्मण. मिलने से हुई है। इस अर्थ में हम कह सकते हैं कि वह ज्ञान जो परब्रह्म को प्राप्त. करने का मार्ग दिखाए वह उपनिषद् है। उपनिषदों के रचनाकाल के सम्बन्ध में इनका अलग निर्णय. करना सर्वथा असम्भव है। श्रीराधाकृष्णन् के मतानुसार इनका रचनाकाल छठी.

गीता और उपनिषद् पढ़ने के बाद राहुल ने क्या कहा.

77 Pages Size 12 MB मुफ्त डाउनलोड करें माण्डूक्य उपनिषद् पी.​डी.ऍफ़ प्रारूप में Free Download Mandukya Upanishad in PDF Format. उपनिषद् का वो ज्ञान, जिसे हासिल करने में राहुल. Question – 23 भारत के राजचिह्न में प्रयुक्त होने वाले शब्द ​सत्यमेव जयते किस उपनिषद से लिया गया है? The word Satyamev Jayate, which is used in the Indian Emblem, is derived from which Upanishad? A मुण्ड्को उपनिषद् Mundaka Upanishad B कंठ उपनिषद् Kanth Upanishad. Organizing Mahayagya In Upanishad Ashram उपनिषद् Patrika. उपनिषद् का हिन्दी मे अर्थ Meaning of उपनिषद् in Hindi. हिन्दू धर्म के महत्त्वपूर्ण श्रुति धर्मग्रन्थ जिसमें ब्रह्म और आत्मा आदि के स्वभाव और सम्बन्ध का बहुत ही दार्शनिक और ज्ञानपूर्वक वर्णन है. उपनिषदों में योग Yog Bharati. Sunskrit. स्वाध्यायोऽध्येतव्यः. गृहपृष्ठः वेदाः वेदांगानि दर्शनम् साहित्यम् संस्कृत त्रैमासिक ​परीक्षणम् सम्पर्कः. Quiz Category: उपनिषद्. उपनिषद् ​प्रश्नपत्रम् १ उपनिषद् प्रश्नपत्रम् २. Copyright © 2019 Proudly powered by WordPress.

ईशा उपनिषद् Mother and Sri Aurobindo.

अथवा उपनिषद् ही क्या है - इसे भी बहुत थोड़े लोग ही जानते हैं । ऋग्वेद के वक्ता ऋषियों ने ईश्वरी प्रेरणा से आध्यात्मिक ज्ञान को शब्दों और छन्दों में प्रकट किया था, उपनिषद् के ॠषियों ने साक्षात् दर्शन द्वारा उस ज्ञान का स्वरूप देख थोड़े. उपनिषद् अनुवाद हिन्दी अंग्रेजी शब्दकोश Glosbe. अतः वेदों के रचनाकार का निर्धारण एक कठिन कार्य है. कुछ लोग इन्हें ईशा के 6000 वर्ष पूर्व के मानते हैं और कुछ इनका रचनाकाल 1500 ई.पू. बतलाते हैं. प्रत्येक वेद के अपने अपने ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् तथा उपवेद Brahman, Aranyak, Upnishada. उपनिषद् का अर्थ Meaning of उपनिषद् in English And शब्द. श्री मद्भगवद गीता एक सम्पूर्ण उपनिषद्. श्रीमद्भगवद्‌गीता हिन्दुओं के पवित्रतम ग्रन्थों में से एक है। महाभारत के अनुसार कुरुक्षेत्र युद्ध में भगवान श्री कृष्ण ने गीता का सन्देश अर्जुन को सुनाया था। यह महाभारत के भीष्मपर्व. वाणिज्य सेतु. उपनिषद् हिन्दी शब्दकोश में अनुवाद अंग्रेजी Glosbe, ऑनलाइन शब्दकोश, मुफ्त में. Milions सभी भाषाओं में शब्दों और वाक्यांशों को ब्राउज़ करें.

उपनिषद कितने है Answers of Question OnlineTyari.

सनातन धर्म में उपनिषदों का विशिष्ट स्थान है। आदिशंकराचार्य ने उपनिषद् का तादात्म्य Upanishads Inspire Search of Truth, Spiritual Hindi News Hindustan. श्री मद्भागवत गीता सम्पूर्ण उपनिषद् Speaking Tree. राहुल पर गीता और उपनिषद् का प्रभाव. गीता और उपनिषद् पढ़ने के बाद राहुल ने क्या कहा? राहुल पर गीता और उपनिषद् का प्रभाव​. By. Team PGurus. August 16, 2017. Facebook Twitter Google Pinterest WhatsApp. राहुल पर गीता और उपनिषद् का प्रभाव. यह एक कल्पना है. वेद, उपनिषद् और पुराण है हनुमान चालीसा पं. सबसे पुराने जो उपनिषद हैं उनका नाम है ब्रदर अन्य का और चांद उग गया है और यह जो है जिनकी सो और पढ़ें. Likes 37 Dislikes views 1853. WhatsApp icon. fb icon. play. user img follow फॉलो. shekhar11. Volunteer. 0:11. सबसे पुराना उपनिषद कौन सा है तो हिंदू धर्म में कुल 11.

भारत उपनिषद् से आगे अब मंगल मिशन की Navbharat Times.

August 1952. गायत्री चर्चा गायत्री उपनिषद्. Read Text Version. Write Your Comments Here: gurukulam Facebook Twitter Telegram WhatsApp. . ॐ भू र्भुवः स्वः तत् स वि तु र् व रे णि यं भ र्गो दे व स्य धी म हि धि यो यो नः प्र चो द या त्. बृहदारण्यक उपनिषद्. बृहदारण्यक उपनिषत् शुक्ल. Meaning of उपनिषद् in Hindi. हिन्दू धर्म के महत्त्वपूर्ण श्रुति धर्मग्रन्थ जिसमें ब्रह्म और आत्मा आदि के स्वभाव और सम्बन्ध का बहुत ही दार्शनिक और ज्ञानपूर्वक वर्णन है किसी के पास बैठना। ब्रह्म विद्या की प्राप्ति के लिए गुरू के पास जाकर. सत्य की खोज की प्रेरणा देते हैं उपनिषद् Hindustan. Upanishd उपनिषद् का अर्थ अंग्रेजी में जानें. History 3 Now Grow Up. 1 पुनर्जन्म सिद्धान्त, 2 दुःख सिद्धान्त, 3 मोक्ष सिद्धान्त, 4 कर्म सिद्धान्त.

कथा संस्कृति खंड नौ उपनिषद् की तीन कथाएँ.

शंकराचार्य ने ईशा उपनिषद् के ज्ञानकाण्ड और कर्मकाण्ड को अलग और परस्पर विरोधी शिक्षा समझकर ऐसी ही व्याख्या की है । शंकर हैं ज्ञानमार्गी अद्वैतवादी - वेद में सर्वत्र ज्ञानमार्ग की प्रशंसा और कर्म की हीनता को, अद्वैतवाद के परिपोषक. माण्डूक्य उपनिषद् Mandukya Upanishad OurHindi. उपनिषद् विद्या और वेदवती वैदिएक दूसरे के पर्याय बन गए हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से संस्कृत में बी.ए ओनर्स और एम.ए. करने के पश्चात् उन्होंने श्वेताश्वतर उपनिषद के भाष्यों का एक अध्ययन विषय पर 1977 में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उपनिषद्. Know The Upanishads उपनिषद् Rudraksha World. उपनिषद की संख्या ऋग्वेद से सम्बद्ध 10 उपनिषद् शुक्त यजुर्वेद की 19, कृष्णयजुर्वेद की 32, सामवेद की 16 और अथर्ववेद से सम्बद्ध 31 उपनिषद् हैं।.

उपनिषद् – Sunskrit.

प्रथम अध्याय. उपनिषद अथवा वेदान्त परिचय और स्वरूप. परिभाषा उपनिषद् शब्द की व्युत्पति प्रसिद्ध भारतीय विद्वानों. की दृष्टि में उपनिषद् । पाश्चात्य विद्वानों की दृष्टि में उपनिषद्. उपनिषदों के स्रोत और उनकी संख्या उपनिषदों का रचनाकाल. ST.com योगकुण्डल्य उपनिषद् में हठयोग साधना. गोरख उपनिषद् ॥ श्रीराम ॥ श्री नाथ परमानन्द है विश्वगुरु है निरञ्जन है विश्वव्यापक है महासिद्धन कै लक्ष्य है तिन प्रति हमारे आदेश होहु ॥ इहॉं आगे अवतरन ॥ एक समै विमला नाम महादेवी किंचितु विस्मय जुक्त भई श्रीमन्महा गोरक्षनाथ. फाइनल अध्याय 2. उपनिषद् उपनिषद् हिन्दू धर्म के महत्त्वपूर्ण श्रुति धर्मग्रन्थ हैं। ये वैदिक वाङ्मय के अभिन्न भाग हैं। इनमें परमेश्वर, परमात्मा ब्रह्म और आत्मा के स्वभाव और सम्बन्ध का बहुत ही दार्शनिक और ज्ञानपूर्वक वर्णन दिया गया है। उपनिषदों में.

गोरख उपनिषद् TransLiteral Foundation.

योगकुण्डल्य उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय परम्परा से सम्बद्ध है जिसमें कुल तीन अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में आसन, प्राणायाम, शक्तिचालिनी मुद्रा एवं तीन प्रकार के बंधों का वर्णन है। द्वितीय अध्याय में खेचरी मुद्रा की विवेचना करने के साथ साथ. गायत्री चर्चा गायत्री उपनिषद् Literature Hindi All. मूल्य Rs. 0 पृष्ठ 534 साइज 17.68 MB लेखक रचियता स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती Swami Darshananand Sarswti उपनिषद् प्रकाश पुस्तक पीडीऍफ़ डाउनलोड करें, ऑनलाइन पढ़ें, Reviews पढ़ें Upnishad Prakash Free PDF Download, Read Online, Review. उपनिषद् वर्णित गुरु पूजन Nikhil Mantra Vigyan. Know The Upanishads उपनिषद्. A treasure trove of wisdom, the ancient texts are elaborated upon in simple words, explaning The mystry of Creation. The real purpose of existence. The concept of Ishwara, Atma and Pramatma. The importance of realising ones true Self The meaning to Moksha liberation from the cycle.

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हिंदुओं में वेद की महिमा सब से अधिक है क्योंकि उन का यह भ्रमित दावा है कि उन में विश्व ज्ञान भरा है। इसी तरह हिंदुओं की उपनिषदों में भी आस्था है। इसी कारण धर्म, संस्कृति आदि की चर्चाओं में वेद व उपनिषदों का जितना उल्लेख होता है, उतना. उपनिषद् प्रकाश Upnishad Prakash E Pustakalaya. शास्त्री वेद, उपनिषद् और पुराण है हनुमान चालीसा पं. शास्त्री. Nov 19, 2016, AM IST. बांसवाड़ा। रामस्वयं ब्रह्म जो स्वर्ग, लक्ष्मण शेषनाग के अवतार हैं, जिनका वास पाताललोक में है, जानकी की उत्पत्ति पृथ्वी से हुई इसलिये पृथ्वीलोक और. शांति मंत्र: Pre requisites for वेदांत उपनिषद् Prachodayat. अथर्ववेद. कोई उपलब्ध नहीं. यद्यपि अथर्ववेद का पृथक् से कोई आरण्यक प्राप्त नहीं होता है, तथापि उसके गोपथ ब्राह्मण में आरण्यकों के अनुरूप बहुत सी सामग्री मिलती है । उपनिषद्. उपनिषद् वेदों के दार्शनिक विवेचन करने वाले ग्रंथ है.

उपनिषद काल ज्ञान के धरातल पर वेदों को मिली मात.

ऋग्वेद के ऐतरेय नामक ब्राह्मण ग्रन्थ के दुसरे अंक के अध्याय ४,५ और ६ का नाम ऐतरेय उपनिषद् है इसमें ब्रह्म विद्या का निरूपण किया गया है इश्वर द्वारा सृष्टि रचना का संकल्प करके लोकों व लोकपालों की रचना तथा उनके आवास रूप मनुष्य. निम्नलिखित में से कौन सा सिद्धान्त उपनिषद् से. उपनिषद् हिन्दू धर्म के महत्त्वपूर्ण श्रुति धर्मग्रन्थ हैं। ये वैदिक वाङ्मय के अभिन्न भाग हैं। इनमें परमेश्वर, परमात्मा ​ब्रह्म और आत्मा के स्वभाव और सम्बन्ध का ब…. Indian History Quiz 10 My Online Pathshala. मातृ भाषा से प्रेम छत्तीसगढ़ी में लिखा उपनिषद्. रायपुर। कहा जाता है कि अगर एक पुरुष को शिक्षित किया जाता है, तब एक आदमी ही शिक्षित होता है, लेकिन जब एक औरत को शिक्षित किया जाता है, तब एक पीढ़ी शिक्षित होती है। इस कथन से भी आगे बढ़कर​. उपनिषद् ग्यारह हैं, उनके नाम मेरे पास हैं, लेकिन. हम यह भी मान लेते हैं की असुर सच में बहुत ही दुराचारी थे, जबकि इन्हीं शास्त्रों में उनके गुंडों को भी बताया गया है इसलिए मेरा तो यही विचार है की हम अपने धर्म के वास्तविक शास्त्रों में वेद और उपनिषद् के बारे में बहुत ही कम जानते हैं. विभिन्न. हम अपने धर्म के वास्तविक शास्त्रों में वेद और. 9. निम्नलिखित में से उत्तर वैदिक काल में लिखे गये ग्रंथों का सही क्रम कौन सा है? a वेद, उपनिषद्, ब्राह्मण और आरण्यक. b​ वेद, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्. c उपनिषद्, वेद, ब्राह्मण और आरण्यक. d वेद, आरण्यक, ब्राह्मण और उपनिषद्. Correct! Wrong!. Upanishadon Ki Kathayen Kitaabshala. उपनिषदों में योग उपनिषद् शब्द उप नि उपसर्गक सद् धातु से क्विप् प्रत्यय जोड़ने पर निष्पन्न हुआ है। सद् धातु के तीन अर्थ होते हैं। विशरण अर्थात नाश होना, गति अर्थात प्राप्त होना, एवं अवसादन अर्थात शिथिल करना। इस प्रकार जिस.

गीता, वेद व उपनिषद् धार्मिक नहीं, वैज्ञानिक ग्रंथ.

१०८ उपनिषद एवं उनका वर्गीकरण १०८ उपनिषदों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जाता है १ ऋग्वेदीय - १० उपनिषद् २ शुक्ल यजुर्वेदीय - १९. Upnishad Kitna Sarthak Hai Aaj Ka Gyan उपनिषद्. उपनिषद् में उप और नि उपसर्ग हैं । सद् धातु गति के अर्थ में प्रयुक्त होती है। गति शब्द का उपयोग ज्ञान, गमन और प्राप्ति इन तीन संदर्भो में होता है । यहाँ प्राप्ति अर्थ अधिक उपयुक्त है । उप सामीप्येन, नि नितरां, प्राम्नुवन्ति परं ब्रह्म यया. अथर्वशिर उपनिषद् ब्रह्मविद्या खन्ड 1 All World. है कि विश्व में व्याप्त चेतन शक्ति ब्रह्म है और मनुष्य में जो चेतन शक्ति व्याप्त है. वह आत्मा है। उपनिषद् इस बात पर पुन: पुन: बल देते हैं कि ये दोनों चेतन. शक्तियाँ एक ही है।3 ब्राह्मण तथा आरण्यक ग्रन्थों में ब्रह्म और आत्मा पृथक. तत्व देख. उपनिषद् gk question answers. राहुल गांधी आज कल गीता और उपनिषद् पढ़ रहे हैं ताकि संघ परिवापर हिंदुत्व के मैदान में दार्शनिक घेरा डाला जा सके. हम यहां आपको उपनिषद् की वो पांच मजेदार बातें बता रहे हैं, जिसे जानने में राहुल गांधी को अभी टाइम लगेगा. क्या होते हैं.

सकल्प शक्ति द्वारा चिकित्सा

आध्यात्मिक जगत मे संकल्प शक्ति को जीवन का आधार माना गया है। उपनिषद के अनुसार संकल्पमयो$यं पुरुष: अर्थात मनुष्य संकल्प का ही बना हुआ है। सब तरह की इच्॰आ का मू...