अवधिज्ञान

जैनसंमत आत्ममात्र सापेक्ष प्रत्यक्ष ज्ञान का एक प्रकार अवधिज्ञान है। परमाणपर्यंरूपी पदार्थ इस ज्ञान का विषय है। इसका विपर्यय विभंगज्ञान है। इसकी लब्धि जन्म से ही नारकों और देवों को होती है। अतएव उनका अवधिज्ञान भवप्रत्यय और शेष पंचेंद्रियतिर्यच और मनुष्यों का क्षायोपशयिक अथवा गुण प्रत्यय है, अर्थात् तपस्या आदि गुणों के निमित्त से उन्हें प्राप्त होनेवाली यह एक ऋद्धि है। गणगार को उनके गुणों के अनुसार प्राप्त होनेवाले अवधिज्ञान के ये छह भेद हैं-आनुगामिक, अनानुगामिक, वर्धमान, हीयमान, अवस्थित और अनवस्थित।

मत ज ञ न स ज न गए पद र थ क व षय म व श ष ज नन क श र तज ञ न कहत ह अवध ज ञ न - द रव य क ष त र कल भ व क मर य द ल ए ह ए र प द रव य क स पष ट प रत यक ष
ज न ह पहल ब र द ख कर ल ग च त त ह न लग थ क लकर प रत श र त न अपन अवध ज ञ न स इसक क रण समझ ल ग क समझ य क र शन प रद न करन व ल व क ष क
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अत न द र य ज ञ न क प र प त ह ई ह अत न द य ज ञ न क त न प रक र ह - अवध ज ञ न मन पर यवज ञ न और क वलज ञ न इन सबक प र प त क ल ए समत क स धन एक

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अवधिज्ञान: ज्ञान का एक भेद, तत्वार्थ सूत्र प्रश्नोत्तरी, तत्वार्थ सूत्र प्रश्न उत्तर, तत्वार्थ सूत्र में कितने सूत्र है, सम्यक ज्ञान के अंग

ज्ञान का एक भेद.

PrqFkZ v k Shodhganga. ३ अवधिज्ञान द्रव्य क्षेत्र कल भाव की मर्यादा लिए हुए रूपी द्रव्य के स्पष्ट प्रत्यक्ष ज्ञान को अवधि ज्ञान कहते है. तत्वार्थ सूत्र प्रश्नोत्तरी. JAIN DARSHAN: 05 16 18. साध्वीश्री ने बताया कि कैसे माँ त्रिशला को 9 माह 8 दिन की प्रसव पीड़ा के बाद भगवान महावीर का जन्म हुआ और भगवान महावीर ने माँ त्रिशला के गर्भ मे ही कायोत्सर्ग, त्रिगुप्ति साधना व अवधि ज्ञान किया और तत्पश्चात् उनका जन्म. History SanghiJi Jain Mandir. यह भले ही अवधिज्ञान परक न हो पर सूचना परक तो है ही? तीनों लोकों की रचना के प्रति पौराणिक मत को 25 30 लाख वर्ष पूर्व से संबंधित मान लें तो. कोई विवाद नहीं पैदा होता हैं । 30 लाख वर्ष पूर्व परिवर्तनशील भू रचना आगम में वर्णित स्वरूप में. हो सकती.

आनंद श्रावक Jin Darshan.

मूल्य Rs. 0 पृष्ठ 280 साइज 8 MB लेखक रचियता मुनीम धरमचंद Munim Dharamchand पुस्तक पीडीऍफ़ डाउनलोड करें, ऑनलाइन पढ़ें, Reviews पढ़ें Dharamcharcha Sangrah Free PDF Download, Read Online, Review. ग्राफ़िक1 पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर. अवधि ज्ञान – इन्द्रिय और मन पर निर्भर रहे बिना केवल आत्मा के द्वारा रूपी तथा मूर्त्त पदार्थों को साक्षात् कर लेने वाले ज्ञान को अवधि ज्ञान कहते हैं इसमें केवल रूपी प्दार्थों को देखने – जानने की क्षमता होती है 2. मन पर्यय ज्ञान – जब मन. Automatically generated PDF from existing images. सुरेन्द्र सिंह पोखरना ने कहा कि श्रीमती ऐनीबिसेण्ट ने अवधिज्ञान की सहायता से परमाणु एवं नाभिक के सूक्ष्मकणों.

Raipur ज्ञान तत्व की आराधना से मोक्ष को प्राप्त.

इसमें इसरो के पूर्व वैज्ञानिक डॉ सुरेंद्र सिंह पोखरना ने कहा कि एनीबिसेंट ने अवधिज्ञान की सहायता से परमाणु एवं नाभिक के सूक्ष्म कणों इलेक्ट्रॉन प्रोटोन एवं न्यूट्रोन के भी सूक्ष्म भागों को देखा थाजिसके अनेक प्रमाण. Jain kitne Prakar ke Hote Hain ​. गृहवास में ज्ञान मति, श्रुत, अवधिज्ञान. 21. दीक्षा तिथि मार्गशीर्ष कृष्णा १०. 22. दीक्षा स्थल क्षत्रियकुण्डपुर. 23. दीक्षा के समय तप दो दिन की तपस्या. 24. दीक्षा पर्याय ४२ वर्ष​. 25. दीक्षा वृक्ष अशोक वृक्ष. 26. दीक्षा परिवार. तीर्थंकर की विभिन्न विशेषताएं Acharya Shri Gyan. अवधिज्ञान. संज्ञा. परिभाषा जैनशास्त्र के अनुसार गड़ी, छिपी या दबी हुई चीजें दिखाई देने की क्रिया या वह जिसके द्वारा जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी, अंधकार तथा छाया से व्यवहृत द्रव्यों का प्रत्यक्ष ज्ञान हो और आत्मा का भी ज्ञान हो वाक्य में.

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प्र.२७. सम्यक् ज्ञान के भेद बताइये? उत्तर मतिश्रुतावधिमन:​पर्ययकेवलानि ज्ञानम् । मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन: पर्यय ज्ञान, और केवलज्ञान ये पांच सम्यक्ज्ञान हैं । प्र.​२८. कितने ज्ञान प्रमाण हैं? उत्तर तत्प्रमाणे ।. Final Question. गौतम स्वामी को अपने घर आया देख आनंद बड़ा प्रसन्न हुआ तथा अपने बिस्तर पर लेटे लेटे उनको वंदन किया जब दोनों में चर्चा होने लगी तब आनंद ने अपने अवधिज्ञान के बारे में गौतम स्वामी को बताया तथा कहा की वो बारहवे देवलोतक देख सकता है, इस पर. ऐनीबिसेण्ट के अवधिज्ञान की हुंई व्याख्या. अवधिज्ञान वह ज्ञान जिस में तीनों लोकों का ज्ञान प्राप्त किया जाता है तथा यह आत्मा से सम्बन्ध रखता है। अतिशय क्षेत्र वह स्थान जहाॅं पर दैवी शक्तियों द्वारा चमत्कार किया गया हैं, जैसे महावीर जी, पद्मपुराजी। अलोकाकाश लोक से बाहर के.

ज्ञान की आराधना बिना सफलता नहीं मिलती है.

मनुष्य और तिर्यंचों में बहुत कम जीवों को अवधिज्ञान होता है । यही कारण है कि. मनुष्य और तिर्यंचों को होनेवाले अवधिज्ञान को क्षयोपशमनिमित्तक कहा गया है। अवधिज्ञान के संबंध में तत्त्वार्थसूत्र में दो सूत्र प्राप्त होते हैं, जो इसप्रकार. अवधिज्ञान हिंदी शब्दमित्र. अशान्ति ही अशान्ति होती है वहां भी आपके पुण्यमयीं शरीर से निकलने वाले परमाणुओं ने एक पल को. सुख शान्ति का वातावरण बना कर नारकियों को भी आपके जन्म की शुभसूचना दे दी​। जब सौधर्म इन्द्र को. अपने दिव्य अवधिज्ञान से यह ज्ञात हुआ कि आपका. अनटाइटल्ड जिनागम सार जिनागम सार जैन. एक कथा के माध्यम से समझाया के 1 साधु काउसग्ग में खड़े थे और उन्हें अवधिज्ञान हो गया, काउसग्ग में खड़े खड़े ही उन्होंने अवधिज्ञान में पहले देवलोक में 1 घटना देखी और मोह के कारण हँसे और उनका अवधिज्ञान तभी वापिस चला गया । आगे बताया के मन.

Question.

2011 08 10:33. 163434. अवगम, 1, 203.110.243.0 locate, 2011 08 10 10​. 163435. अवधिज्ञान, 1, 203.110.243.0 locate, 2011 08 10:33. जो जीता है सो जीव कहा, उपयोगमयी वह होता है।. उनमें मति श्रुत मतिज्ञान और श्रुतज्ञान दोय यह दोनों ​परोक्ष परोक्षज्ञान हैं । अक्ष मनतैं इन्द्रियों तथा. मनके निमित्तसे उपजाहीं उत्पन्न होते हैं । अवधिज्ञान. अवधिज्ञान और मनपर्जय मनःपर्ययज्ञान दो यह दोनों ज्ञान. सर्च हिस्ट्री Search history Hindi Wordnet. क अवधिज्ञान का क्षेत्र कितना है? ख छप्पन अन्तर्वीप कहां है? ग चारित्र का उत्थान व पतन कहां होता है? तथा चारित्र की अल्पबहुत्व का क्या क्रम है? श्रावक संबोध20. प्र. 7 कोई चार पद्य लिखें। क खाद्य पदार्थ व वस्त्र की सीमा करने.

JAIN SHABDKOSH जैन – पूजा.

उन्होंने कहा वर्तमान में हमारे पास केवलज्ञान तो प्रकट है ही नहीं और अवधिज्ञान किसी किसी के पास, कभी हो भी सकता हैं, अनुमान के अनुसार भिक्षु स्वामी को संभवत: अवधिज्ञान का अंश हुआ हो सकता है। संथारा हो, परिणाम अच्छा हो, तो श्रावक या. उर्ध्व लोक वर्णन Jain Khagol – sky – The Jainsite Worlds. अवधिज्ञान ४. मन:पर्ययज्ञान ५. केवलज्ञान। प्रश्न मतिज्ञान किसे कहते हैं? उत्तर पाँच इन्द्रिय और मन की सहायता से होने वाला ज्ञान मतिज्ञान कहलाता है। उत्तर अवधिज्ञान, मन:​पर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये प्रत्यक्ष ज्ञान हैं।. आठ कर्मो में मोह ही सबसे खतरनाक: ललितशेखर विजय. ज्ञान के पांच प्रकार हैं मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्यवज्ञान और केवलज्ञान। पांच ज्ञानों में प्रथम दो. ज्ञान परोक्ष ज्ञान हैं, जिनका विस्तृत विवेचन इस इकाई में किया जा रहा है। fversity Rahu. 1.0 उद्देश्य Objectives. इस इकाई का अध्ययन. तत्वार्थ सूत्र अध्याय १ सूत्र २१ सूत्र ३३ Front Desk Architects. स्वर्ग के देवों में सुख, कांति, लेश्याविशुद्धि व इन्द्रियों के विषय और अवधि ज्ञान का विषय नीचे वाले देवों से ऊपर के देवों में अधिक होता है और गति, शरीऔर परिग्रह अभिमान में ऊपर – ऊपर हीनता होती हैं। स्वर्गों में इन्द्रों का वर्णन?.

सफलता तीन बातों पर निर्भर होती है श्रद्धा, ज्ञान.

ङ श्रुत के समुच्चय रूप से कितने प्रकार हैं, व्याख्या सहित लिखें तथा मति ज्ञान व श्रुत ज्ञान में भेद. लिखें। 4 किन्हीं छह प्रश्नों के उत्तर लिखें. क लब्धि अक्षर किसे कहते हैं? ख क्षायोपशमिक अवधिज्ञान किनके होता है?. Dharamcharcha Sangrah मुनीम धरमचंद Munim. पता address, दिनांक समय date time. 163898. अवगम, 1, 203.110.243.0 ​locate, 2011 08 10:07. 163899. अवधिज्ञान, 1, 203.110.243.0 locate.

भाग दौड़ वाली जिन्दगी से व्यक्ति अपना स्वास्थ्य.

उत्तर पत्र में अभ्यासक्रम का नंबर लिखना जरूरी है। प्रश्न नं. १ रिक्त स्थान की पूर्ति करो. २०. १. सत्य वचन के कारण.​. आज भी जिंदा है। २. शंखला से बंधे दीपक समान. अवधिज्ञान है। ३. महामुनियों की. को प्राप्त कराने वाला ऐसा,. पार्ट 2.pmd Vitragvani. ऐरावत हाथी ने अपने 2 रूप बनाए, इन्द्र ने यह देखकर एक पर अपना दण्ड रखा और दुसरे पर स्वयं बैठ गया हाथी रूप बनाते गया और इन्द्र कुछना कुछ रखते गए फिर शक्रेन्द्र महाराज ने भी अपने अवधिज्ञान का उपयोग लगा कर पता लगाया कि यह मेरे पूर्व.

अनटाइटल्ड Kopykitab.

जैन वाङ्मय में पांच ज्ञान की बात आती है - मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यायज्ञान और. केवलज्ञान। केवलज्ञान विशुद्ध क्षायिक भाव वाला ज्ञान है, बाकी शेष चार ज्ञान क्षायोपशमिक भाव निष्पन्न. ज्ञान हैं। केवलज्ञान. ज्ञान एवं पाठ्यचयाा Knowledge and Curriculum शिक्षक. उन्होंने आगे कहा कि भगवान महावीर जन्म से ही तीन ज्ञान मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधिज्ञान के स्वामी थे। उनकी दीक्षा के साथ उन्हें चौथा ज्ञान मन:पर्याय प्राप्त हुआ। इसके पश्चात वे वैरागी अवस्था में रहे फिर उन्हें केवलज्ञान.

1⃣ जीव को अवधि ज्ञान कितनी बार हो सकता Mahavir.

सूत्र ११ से २० तक का सिद्धान्त. ईहादि का स्वरूप. २१. अवधिज्ञान का वर्णन – भव और. १६. अवग्रहादि के विषयभूत पदार्थ. गुण अपेक्षा से. बहु, बहुविधादि बारह भेद की व्याख्या ५७ क्षयोपशम निमित्तक अवधिज्ञान. प्रत्येक इन्द्रिय द्वारा होनेवाले इन बारह. तत्वार्थ सूत्र प्रश्नोत्तरी - प्रथम अध्याय. उपस्थित धर्म प्रेमियों को अनुपम मुनि जी महाराज ने भगवान पा‌र्श्वनाथ जी की जीवन गाथा को आगे बढ़ाते हुए बताया कि जब भगवान पा‌र्श्वनाथ का जन्म हुआ उन्हे मति ज्ञान, श्रृतज्ञान व अवधिज्ञान यह तीनों ज्ञान थे। पा‌र्श्वनाथ युवा. गुण प्रत्यय अवधिज्ञान के भेद करणानुयोग JinSwara Forum. बैठाकर इस चतुर्थकालीन नगर संग्रामपुर आठवीं शताब्दी में सांगानेर का नाम संग्रामपुर ही था के इस बावड़ी के किनारे स्थित अति प्राचीन तल्ले वाले मंदिर को ध्यान में रखकर अथवा इसके अतिशय से प्रभावित होकर अथवा यक्ष ने अवधिज्ञान से जानकर.

एनीबिसेंट के अवधिज्ञान पर व्याख्यान Hindi Latest News.

अवधिज्ञान Meaning in Hindi. 1. जैनशास्त्र के अनुसार गड़ी, छिपी या दबी हुई चीजें दिखाई देने की क्रिया या वह जिसके द्वारा जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी, अंधकार तथा छाया से व्यवहृत द्रव्यों का प्रत्यक्ष ज्ञान हो और आत्मा का भी ज्ञान हो. ध्यान और अवधि ज्ञान 1 J. सर्वोच्च पद का अधिकारी सौधर्म इन्द्र आदि. होते नतमस्तक उन तीर्थंकर भगवान के आगे. जन्म लेते ही उनके इस धरा पे. ऐसी महिमा झलक जाती उनके ज्ञान में. हो जाता जिससे उन्हें सम्यक्दर्श न. उसी समय. मनुष्यों में नहीं होता अवधिज्ञान. Chha Dhala Hindi Original language. Gatha 3: samyaggyAnke. अवधि ज्ञान 4. मन:पर्याय ज्ञान, और 5. कैवल्य ज्ञान। इंद्रियों व मन द्वारा जो पदार्थों का बोध होता है, उसे मतिज्ञान कहते हैं। मतिज्ञान द्वारा जाने हुए पदार्थों को विशेष रूप से जानना या श्रुतज्ञान कहते हैं। द्रव्य, क्षेत्र, काल. श्री पार्श्वनाथ भगवान भाग 4 Voice Of Jains. गुण प्रत्यय अवधिज्ञान के 2 भेद अनुगामी तथा अननुगामी के भी 2 प्रभेदों में उनकी क्षेत्र सम्बन्धी मर्यादा को स्पष्ट किया है। अवधिज्ञान की परिभाषा वाली मर्यादा जो द्रव्य ​क्षेत्र काल भाव की मर्यादा लिए ज्ञान होता है तथा. जैसी करनी वैसी भरनी, कार्तिक सेठ की कहानी. अवधिज्ञान. Clairvoyance the power of seeing in the mind either future events or things that exist or are happening out of sight upto a particular limit. जो द्रव्य क्षेत्र काल और भाव की अपेक्षा आवधि अर्थात् सीमा से युक्त अपने विषयभूत पदार्थ को जाने।.