• लेश्या

    जैन दर्शन के सन्दर्भ में लेश्या कर्म का एक सिद्धान्त है। कृष्ण आदि छः प्रकार के पुद्गल द्रव्यों के सहयोग से स्फटिक के परिणमन की तरह होने वाला आत्म-परिणाम लेश...

  • द्रव्य (जैन दर्शन)

    द्रव्य शब्द का प्रयोग जैन दर्शन में द्रव्य के लिए किया जाता है। जैन दर्शन के अनुसार तीन लोक में कोई भी कार्य निम्नलिखित छः द्रव्य के बिना नहीं हो सकता। अर्था...

  • चक्रवर्ती

    चक्रवर्ती प्राचीन भारत का एक संस्कृत शब्द है जो दुनिया जीतने वाले राजाओं के लिए प्रयोग किया जाता है। जैन दर्शन के अनुसाहर काल में ६३ शलाकापुरुष होते है जिसमे...

  • कैवल्य

    विवेक उत्पन्न होने पर औपाधिक दुख सुखादि - अहंकार, प्रारब्ध, कर्म और संस्कार के लोप हो जाने से आत्मा के चितस्वरूप होकर आवागमन से मुक्त हो जाने की स्थिति को कै...

  • केवली

    जैन दर्शन के अनुसार केवल ज्ञान से संपन्न व्यक्ति केवली कहलाता है। उसे चारों प्रकार के प्रतिबंधक कर्मों का क्षय होने से कैवल्य की सद्य: प्राप्ति होती है । जैन...

  • केवल ज्ञान

    जैन दर्शन के अनुसार केवल विशुद्धतम ज्ञान को कहते हैं। इस ज्ञान के चार प्रतिबंधक कर्म होते हैं- मोहनीय, ज्ञानावरण, दर्शनवरण तथा अंतराय। इन चारों कर्मों का क्ष...

  • कायोत्सर्ग

    दिगम्बर मुनि के ये षड् आवश्यक कार्य हैं: सामयिक, संस्तव, वंदना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायोत्सर्ग। कायोत्सर्ग का शब्दार्थ शरीर के ममत्व का त्याग है। जैन...

  • अकलंक

    अकलंक, जैन न्यायशास्त्र के अनेक मौलिक ग्रंथों के लेखक आचार्य। अकलंक ने भर्तृहरि, कुमारिल, धर्मकीर्ति और उनके अनेक टीकाकारों के मतों की समालोचना करके जैन न्या...

जैन दर्शन

अकलंक

अकलंक, जैन न्यायशास्त्र के अनेक मौलिक ग्रंथों के लेखक आचार्य। अकलंक ने भर्तृहरि, कुमारिल, धर्मकीर्ति और उनके अनेक टीकाकारों के मतों की समालोचना करके जैन न्या...

अनेकांतवाद

अनेकान्तवाद जैन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और मूलभूत सिद्धान्तों में से एक है। मौटे तौपर यह विचारों की बहुलता का सिद्धान्त है। अनेकावान्त की मान्यता है कि भिन्न...

अपरिग्रह

अपरिग्रह गैर-अधिकार की भावना, गैर लोभी या गैर लोभ की अवधारणा है, जिसमें अधिकारात्मकता से मुक्ति पाई जाती है।। यह विचार मुख्य रूप से जैन धर्म तथा हिन्दू धर्म ...

ईर्यापथ आस्रव

ईर्यापथ आस्रव, जैनमत में वर्णित आस्रव का एक भेद है। मन, वचन और काया की सहायता से आत्मप्रदेशों में गति होना जैन धर्म में योग कहलाता है और इसी योग के माध्यम से...

कर्म बन्ध

कर्म-बन्ध का अर्थ है आत्मा के साथ कर्म पुद्गल का जुड़ना। कर्म बन्ध कर्मों के आस्रव के बाद होता हैं। यह जैन दर्शन के अनुसार सात तत्त्वों में से एक हैं।

कायोत्सर्ग

दिगम्बर मुनि के ये षड् आवश्यक कार्य हैं: सामयिक, संस्तव, वंदना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायोत्सर्ग। कायोत्सर्ग का शब्दार्थ शरीर के ममत्व का त्याग है। जैन...

केवल ज्ञान

जैन दर्शन के अनुसार केवल विशुद्धतम ज्ञान को कहते हैं। इस ज्ञान के चार प्रतिबंधक कर्म होते हैं- मोहनीय, ज्ञानावरण, दर्शनवरण तथा अंतराय। इन चारों कर्मों का क्ष...

केवली

जैन दर्शन के अनुसार केवल ज्ञान से संपन्न व्यक्ति केवली कहलाता है। उसे चारों प्रकार के प्रतिबंधक कर्मों का क्षय होने से कैवल्य की सद्य: प्राप्ति होती है । जैन...

कैवल्य

विवेक उत्पन्न होने पर औपाधिक दुख सुखादि - अहंकार, प्रारब्ध, कर्म और संस्कार के लोप हो जाने से आत्मा के चितस्वरूप होकर आवागमन से मुक्त हो जाने की स्थिति को कै...

गुणस्थान

जैन दर्शन में गुण स्थान, उन चौदह चरणों के लिए प्रयोग किया गया हैं जिनसे जीव आध्यात्मिक विकास के दौरान धीरे-धीरे गुजरता है, इससे पहले कि वह मोक्ष प्राप्त करें...

चक्रवर्ती

चक्रवर्ती प्राचीन भारत का एक संस्कृत शब्द है जो दुनिया जीतने वाले राजाओं के लिए प्रयोग किया जाता है। जैन दर्शन के अनुसाहर काल में ६३ शलाकापुरुष होते है जिसमे...

जीव (जैन दर्शन)

जीव शब्द का प्रयोग जैन दर्शन में आत्मा के लिए किया जाता है। जैन दर्शन सबसे पुराना भारतीय दर्शन है जिसमें कि शरीऔर आत्मा को पूर्णता पृथक माना गया है। इन दोनों...

द्रव्य (जैन दर्शन)

द्रव्य शब्द का प्रयोग जैन दर्शन में द्रव्य के लिए किया जाता है। जैन दर्शन के अनुसार तीन लोक में कोई भी कार्य निम्नलिखित छः द्रव्य के बिना नहीं हो सकता। अर्था...

निर्जरा

निर्जरा जैन दर्शन के अनुसार एक तत्त्व हैं। इसका अर्थ होता है आत्मा के साथ जुड़े कर्मों का शय करना। यह जन्म मरण के चक्र से मुक्त होने के लिए आवश्यक हैं। आचार्...

रज्जु (मात्रक)

एक रज्जु या राजलोक वह दूरी है जो कोई देव 2.057.152 योजन प्रति समय के वेग से चलकर ६ मास में तय करता है। यह दूरी लगभग 2.047.540.985.856.000 किलोमीटर या 216.5 प...

लेश्या

जैन दर्शन के सन्दर्भ में लेश्या कर्म का एक सिद्धान्त है। कृष्ण आदि छः प्रकार के पुद्गल द्रव्यों के सहयोग से स्फटिक के परिणमन की तरह होने वाला आत्म-परिणाम लेश...

श्रुतकेवली

श्रुतकेवली, श्रुतज्ञान अर्थात् शास्त्रों के पूर्ण ज्ञाता होते हैं। श्रुतकेवली और केवली, ज्ञान की दृष्टि से दोनों समान हैं, लेकिन श्रुतज्ञान परोक्ष और केवल ज्...

संवर

संवर जैन दर्शन के अनुसार एक तत्त्व हैं। इसका अर्थ होता है कर्मों के आस्रव को रोकना। जैन सिद्धांत सात तत्त्वों पर आधारित हैं। इनमें से चार तत्त्व- आस्रव, बन्ध...

सप्तभंगी नय

स्यादवाद या अनेकान्तवाद या सप्तभङ्गी का सिद्धान्त जैन धर्म में मान्य सिद्धान्तों में से एक है। स्यादवाद का अर्थ सापेक्षतावाद होता है। यह जैन दर्शन के अंतर्गत...

समयसार

समयसार, आचार्य कुन्दकुन्द द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसके दस अध्यायों में जीव की प्रकृति, कर्म बन्धन, तथा मोक्ष की चर्चा की गयी है। यह ग्रंथ दो-दो पंक्‍...

स्यादवाद

स्यादवाद या अनेकांतवाद या सप्तभंगी का सिद्धान्त जैन धर्म में मान्य सिद्धांतों में से एक है। स्यादवाद का अर्थ सापेक्षतावाद होता है। यह जैन दर्शन के अंतर्गत कि...