जन्माष्टमी व्रत कथा

अष्टमी दो प्रकार की है- पहली जन्माष्टमी और दूसरी जयंती। इसमें केवल पहली अष्टमी है।
स्कन्दपुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है। ब्रह्मपुराण का कथन है कि कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में अट्ठाइसवें युग में देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए थे। यदि दिन या रात में कलामात्र भी रोहिणी न हो तो विशेषकर चंद्रमा से मिली हुई रात्रि में इस व्रत को करें। भविष्यपुराण का वचन है- श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता, वह क्रूर राक्षस होता है। केवल अष्टमी तिथि में ही उपवास करना कहा गया है। यदि वही तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो जयंती नाम से संबोधित की जाएगी। वह्निपुराण का वचन है कि कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो तो उसको जयंती नाम से ही संबोधित किया जाएगा। अतः उसमें प्रयत्न से उपवास करना चाहिए।

1. कथा
इंद्र ने कहा है- हे ब्रह्मपुत्र, हे मुनियों में श्रेष्ठ, सभी शास्त्रों के ज्ञाता, हे देव, व्रतों में उत्तम उस व्रत को बताएँ, जिस व्रत से मनुष्यों को मुक्ति, लाभ प्राप्त हो तथा हे ब्रह्मन्‌! उस व्रत से प्राणियों को भोग व मोक्ष भी प्राप्त हो जाए। इंद्र की बातों को सुनकर नारदजी ने कहा- त्रेतायुग के अन्त में और द्वापर युग के प्रारंभ समय में निन्दितकर्म को करने वाला कंस नाम का एक अत्यंत पापी दैत्य हुआ। उस दुष्ट व नीच कर्मी दुराचारी कंस की देवकी नाम की एक सुंदर बहन थी। देवकी के गर्भ से उत्पन्न आठवाँ पुत्र कंस का वध करेगा।
नारदजी की बातें सुनकर इंद्र ने कहा- हे महामते! उस दुराचारी कंस की कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए। क्या यह संभव है कि देवकी के गर्भ से उत्पन्न आठवाँ पुत्र अपने मामा कंस की हत्या करेगा। इंद्र की सन्देहभरी बातों को सुनकर नारदजी ने कहा-हे अदितिपुत्र इंद्र! एक समय की बात है। उस दुष्ट कंस ने एक ज्योतिषी से पूछा कि ब्राह्मणों में श्रेष्ठ ज्योतिर्विद! मेरी मृत्यु किस प्रकाऔर किसके द्वारा होगी। ज्योतिषी बोले-हे दानवों में श्रेष्ठ कंस! वसुदेव की धर्मपत्नी देवकी जो वाक्‌पटु है और आपकी बहन भी है। उसी के गर्भ से उत्पन्न उसका आठवां पुत्र जो कि शत्रुओं को भी पराजित कर इस संसार में कृष्ण के नाम से विख्यात होगा, वही एक समय सूर्योदयकाल में आपका वध करेगा।
ज्योतिषी की बातें सुनकर कंस ने कहा- हे दैवज, बुद्धिमानों में अग्रण्य अब आप यह बताएं कि देवकी का आठवां पुत्र किस मास में किस दिन मेरा वध करेगा। ज्योतिषी बोले- हे महाराज! माघ मास की शुक्ल पक्ष की तिथि को सोलह कलाओं से पूर्ण श्रीकृष्ण से आपका युद्ध होगा। उसी युद्ध में वे आपका वध करेंगे। इसलिए हे महाराज! आप अपनी रक्षा यत्नपूर्वक करें। इतना बताने के पश्चात नारदजी ने इंद्र से कहा- ज्योतिषी द्वारा बतागए समय पर हीकंस की मृत्युकृष्ण के हाथ निःसंदेह होगी। तब इंद्र ने कहा- हे मुनि! उस दुराचारी कंस की कथा का वर्णनकीजिए और बताइए कि कृष्ण का जन्म कैसे होगा तथा कंस की मृत्यु कृष्ण द्वारा किस प्रकार होगी।
इंद्र की बातों को सुनकर नारदजी ने पुनः कहना प्रारंभ किया- उस दुराचारी कंस ने अपने एक द्वारपाल से कहा- मेरी इस प्राणों से प्रिय बहन की पूर्ण सुरक्षा करना। द्वारपाल ने कहा- ऐसा ही होगा। कंस के जाने के पश्चात उसकी छोटी बहन दुःखित होते हुए जल लेने के बहाने घड़ा लेकर तालाब पर गई। उस तालाब के किनारे एक घनघोर वृक्ष के नीचे बैठकर देवकी रोने लगी। उसी समय एक सुंदर स्त्री जिसका नाम यशोदा था, उसने आकर देवकी से प्रिय वाणी में कहा- हे कान्ते! इस प्रकार तुम क्यों विलाप कर रही हो। अपने रोने का कारण मुझसे बताओ। तब दुःखित देवकी ने यशोदा से कहा- हे बहन! नीच कर्मों में आसक्त दुराचारी मेरा ज्येष्ठ भ्राता कंस है। उस दुष्ट भ्राता ने मेरे कई पुत्रों का वध कर दिया। इस समय मेरे गर्भ में आठवाँ पुत्र है। वह इसका भी वध कर डालेगा। इस बात में किसी प्रकार का संशय या संदेह नहीं है, क्योंकि मेरे ज्येष्ठ भ्राता को यह भय है कि मेरे अष्टम पुत्र से उसकी मृत्यु अवश्य होगी।
देवकी की बातें सुनकर यशोदा ने कहा- हे बहन! विलाप मत करो। मैं भी गर्भवती हूँ। यदि मुझे कन्या हुई तो तुम अपने पुत्र के बदले उस कन्या को ले लेना। इस प्रकार तुम्हारा पुत्र कंस के हाथों मारा नहीं जाएगा।
तदनन्तर कंस ने अपने द्वारपाल से पूछा- देवकी कहाँ है? इस समय वह दिखाई नहीं दे रही है। तब द्वारपाल ने कंस से नम्रवाणी में कहा- हे महाराज! आपकी बहन जल लेने तालाब पर गई हुई हैं। यह सुनते ही कंस क्रोधित हो उठा और उसने द्वारपाल को उसी स्थान पर जाने को कहा जहां वह गई हुई है। द्वारपाल की दृष्टि तालाब के पास देवकी पर पड़ी। तब उसने कहा कि आप किस कारण से यहां आई हैं। उसकी बातें सुनकर देवकी ने कहा कि मेरे गृह में जल नहीं था, जिसे लेने मैं जलाशय पर आई हूँ। इसके पश्चात देवकी अपने गृह की ओर चली गई।
कंस ने पुनः द्वारपाल से कहा कि इस गृह में मेरी बहन की तुम पूर्णतः रक्षा करो। अब कंस को इतना भय लगने लगा कि गृह के भीतर दरवाजों में विशाल ताले बंद करवा दिए और दरवाजे के बाहर दैत्यों और राक्षसों को पहरेदारी के लिए नियुक्त कर दिया। कंस हर प्रकार से अपने प्राणों को बचाने के प्रयास कर रहा था। एक समय सिंह राशि के सूर्य में आकाश मंडल में जलाधारी मेघों ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया। भादौ मास की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को घनघोर अर्द्धरात्रि थी। उस समय चंद्रमा भी वृष राशि में था, रोहिणी नक्षत्र बुधवार के दिन सौभाग्ययोग से संयुक्त चंद्रमा के आधी रात में उदय होने पर आधी रात के उत्तर एक घड़ी जब हो जाए तो श्रुति-स्मृति पुराणोक्त फल निःसंदेह प्राप्त होता है।
इस प्रकार बताते हुए नारदजी ने इंद्र से कहा- ऐसे विजय नामक शुभ मुहूर्त में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ और श्रीकृष्ण के प्रभाव से ही उसी क्षण बन्दीगृह के दरवाजे स्वयं खुल गए। द्वापर पहरा देने वाले पहरेदार राक्षस सभी मूर्च्छित हो गए। देवकी ने उसी क्षण अपने पति वसुदेव से कहा- हे स्वामी! आप निद्रा का त्याग करें और मेरे इस अष्टम पुत्र को गोकुल में ले जाएँ, वहाँ इस पुत्र को नंद गोप की धर्मपत्नी यशोदा को दे दें। उस समय यमुनाजी पूर्णरूपसे बाढ़ग्रस्त थीं, किन्तु जब वसुदेवजी बालक कृष्ण को सूप में लेकर यमुनाजी को पार करने के लिए उतरे उसी क्षण बालक के चरणों का स्पर्श होते ही यमुनाजी अपने पूर्व स्थिर रूप में आ गईं। किसी प्रकार वसुदेवजी गोकुल पहुँचे और नंद के गृह में प्रवेश कर उन्होंने अपना पुत्र तत्काल उन्हें दे दिया और उसके बदले में उनकी कन्या ले ली। वे तत्क्षण वहां से वापस आकर कंस के बंदी गृह में पहुँच गए।
प्रातःकाल जब सभी राक्षस पहरेदार निद्रा से जागे तो कंस ने द्वारपाल से पूछा कि अब देवकी के गर्भ से क्या हुआ? इस बात का पता लगाकर मुझे बताओ। द्वारपालों ने महाराज की आज्ञा को मानते हुए कारागार में जाकर देखा तो वहाँ देवकी की गोद में एक कन्या थी। जिसे देखकर द्वारपालों ने कंस को सूचित किया, किन्तु कंस को तो उस कन्या से भय होने लगा। अतः वह स्वयं कारागार में गया और उसने देवकी की गोद से कन्या को झपट लिया और उसे एक पत्थर की चट्टान पर पटक दिया किन्तु वह कन्या विष्णु की माया से आकाश की ओर चली गई और अंतरिक्ष में जाकर विद्युत के रूप में परिणित हो गई।
उसने कंस से कहा कि हे दुष्ट! तुझे मारने वाला गोकुल में नंद के गृह में उत्पन्न हो चुका है और उसी से तेरी मृत्यु सुनिश्चित है। मेरा नाम तो वैष्णवी है, मैं संसार के कर्ता भगवान विष्णु की माया से उत्पन्न हुई हूँ, इतना कहकर वह स्वर्ग की ओर चली गई। उस आकाशवाणी को सुनकर कंस क्रोधित हो उठा। उसने नंदजी के गृह में पूतना राक्षसी को कृष्ण का वध करने के लिए भेजा किन्तु जब वह राक्षसी कृष्ण को स्तनपान कराने लगी तो कृष्ण ने उसके स्तन से उसके प्राणों को खींच लिया और वह राक्षसी कृष्ण-कृष्ण कहते हुए मृत्यु को प्राप्त हुई।
जब कंस को पूतना की मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ तो उसने कृष्ण का वध करने के लिए क्रमशः केशी नामक दैत्य को अश्व के रूप में उसके पश्चात अरिष्ठ नामक दैत्य को बैल के रूप में भेजा, किन्तु ये दोनों भी कृष्ण के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुए। इसके पश्चात कंस ने काल्याख्य नामक दैत्य को कौवे के रूप में भेजा, किन्तु वह भी कृष्ण के हाथों मारा गया। अपने बलवान राक्षसों की मृत्यु के आघात से कंस अत्यधिक भयभीत हो गया। उसने द्वारपालों को आज्ञा दी कि नंद को तत्काल मेरे समक्ष उपस्थित करो। द्वारपाल नंद को लेकर जब उपस्थित हुए तब कंस ने नंदजी से कहा कि यदि तुम्हें अपने प्राणों को बचाना है तो पारिजात के पुष्प ले लाओ। यदि तुम नहीं ला पाए तो तुम्हारा वध निश्चित है।
कंस की बातों को सुनकर नंद ने ऐसा हीहोगा कहा और अपने गृह की ओर चले गए। घर आकर उन्होंने संपूर्ण वृत्तांत अपनी पत्नी यशोदा को सुनाया, जिसे श्रीकृष्ण भी सुन रहे थे। एक दिन श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ यमुना नदी के किनारे गेंद खेल रहे थे और अचानक स्वयं ने ही गेंद को यमुना में फेंक दिया। यमुना में गेंद फेंकने का मुख्य उद्देश्य यही था कि वे किसी प्रकार पारिजात पुष्पों को ले आएँ। अतः वे कदम्ब के वृक्ष पर चढ़कर यमुना में कूद पड़े।
कृष्ण के यमुना में कूदने का समाचार श्रीधर नामक गोपाल ने यशोदा को सुनाया। यह सुनकर यशोदा भागती हुई यमुना नदी के किनारे आ पहुँचीं और उसने यमुना नदी की प्रार्थना करते हुए कहा- हे यमुना! यदि मैं बालक को देखूँगी तो भाद्रपद मास की रोहिणी युक्त अष्टमी का व्रत अवश्य करूंगी क्योंकि दया, दान, सज्जन प्राणी, ब्राह्मण कुल में जन्म, रोहिणियुक्त अष्टमी, गंगाजल, एकादशी, गया श्राद्ध और रोहिणी व्रत ये सभी दुर्लभ हैं।
हजारों अश्वमेध यज्ञ, सहस्रों राजसूय यज्ञ, दान तीर्थ और व्रत करने से जो फल प्राप्त होता है, वह सब कृष्णाष्टमी के व्रत को करने से प्राप्त हो जाता है। यह बात नारद ऋषि ने इंद्र से कही। इंद्र ने कहा- हे मुनियों में श्रेष्ठ नारद! यमुना नदी में कूदने के बाद उस बालरूपी कृष्ण ने पाताल में जाकर क्या किया? यह संपूर्ण वृत्तांत भी बताएँ। नारद ने कहा- हे इंद्र! पाताल में उस बालक से नागराज की पत्नी ने कहा कि तुम यहाँ क्या कर रहे हो, कहाँ से आए हो और यहाँ आने का क्या प्रयोजन है?
नागपत्नी बोलीं- हे कृष्ण! क्या तूने द्यूतक्रीड़ा की है, जिसमें अपना समस्त धन हार गया है। यदि यह बात ठीक है तो कंकड़, मुकुट और मणियों का हार लेकर अपने गृह में चले जाओ क्योंकि इस समय मेरे स्वामी शयन कर रहे हैं। यदि वे उठ गए तो वे तुम्हारा भक्षण कर जाएँगे। नागपत्नी की बातें सुनकर कृष्ण ने कहा- हे कान्ते! मैं किस प्रयोजन से यहाँ आया हूँ, वह वृत्तांत मैं तुम्हें बताता हूँ। समझ लो मैं कालियानाग के मस्तक को कंस के साथ द्यूत में हार चुका हूं और वही लेने मैं यहाँ आया हूँ। बालक कृष्ण की इस बात को सुनकर नागपत्नी अत्यंत क्रोधित हो उठीं और अपने सोए हुए पति को उठाते हुए उसने कहा- हे स्वामी! आपके घर यह शत्रु आया है। अतः आप इसका हनन कीजिए।
अपनी स्वामिनी की बातों को सुनकर कालियानाग निन्द्रावस्था से जाग पड़ा और बालक कृष्ण से युद्ध करने लगा। इस युद्ध में कृष्ण को मूर्च्छा आ गई, उसी मूर्छा को दूर करने के लिए उन्होंने गरुड़ का स्मरण किया। स्मरण होते ही गरुड़ वहाँ आ गए। श्रीकृष्ण अब गरुड़ पर चढ़कर कालियानाग से युद्ध करने लगे और उन्होंने कालियनाग को युद्ध में पराजित कर दिया।
अब कलियानाग ने भलीभांति जान लिया था कि मैं जिनसे युद्ध कर रहा हूँ, वे भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण ही हैं। अतः उन्होंने कृष्ण के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और पारिजात से उत्पन्न बहुत से पुष्पों को मुकुट में रखकर कृष्ण को भेंट किया। जब कृष्ण चलने को हुए तब कालियानाग की पत्नी ने कहा हे स्वामी! मैं कृष्ण को नहीं जान पाई। हे जनार्दन मंत्र रहित, क्रिया रहित, भक्तिभाव रहित मेरी रक्षा कीजिए। हे प्रभु! मेरे स्वामी मुझे वापस दे दें। तब श्रीकृष्ण ने कहा- हे सर्पिणी! दैत्यों में जो सबसे बलवान है, उस कंस के सामने मैं तेरे पति को ले जाकर छोड़ दूँगा अन्यथा तुम अपने गृह को चली जाओ। अब श्रीकृष्ण कालियानाग के फन पर नृत्य करते हुए यमुना के ऊपर आ गए।
तदनन्तर कालिया की फुंकार से तीनों लोक कम्पायमान हो गए। अब कृष्ण कंस की मथुरा नगरी को चल दिए। वहां कमलपुष्पों को देखकर यमुनाके मध्य जलाशय में वह कालिया सर्प भी चला गया।
इधर कंस भी विस्मित हो गया तथा कृष्ण प्रसन्नचित्त होकर गोकुल लौट आए। उनके गोकुल आने पर उनकी माता यशोदा ने विभिन्न प्रकार के उत्सव किए। अब इंद्र ने नारदजी से पूछा- हे महामुने! संसार के प्राणी बालक श्रीकृष्ण के आने पर अत्यधिक आनंदित हुए। आखिर श्रीकृष्ण ने क्या-क्या चरित्र किया? वह सभी आप मुझे बताने की कृपा करें। नारद ने इंद्र से कहा- मन को हरने वाला मथुरा नगर यमुना नदी के दक्षिण भाग में स्थित है। वहां कंस का महाबलशायी भाई चाणूर रहता था। उस चाणूर से श्रीकृष्ण के मल्लयुद्ध की घोषणा की गई। हे इंद्र!
कृष्ण एवं चाणूर का मल्लयुद्ध अत्यंत आश्चर्यजनक था। चाणूर की अपेक्षा कृष्ण बालरूप में थे। भेरी शंख और मृदंग के शब्दों के साथ कंस और केशी इस युद्ध को मथुरा की जनसभा के मध्य में देख रहे थे। श्रीकृष्ण ने अपने पैरों को चाणूर के गले में फँसाकर उसका वध कर दिया। चाणूर की मृत्यु के पश्चात उनका मल्लयुद्ध केशी के साथ हुआ। अंत में केशी भी युद्ध में कृष्ण के द्वारा मारा गया। केशी के मृत्युपरांत मल्लयुद्ध देख रहे सभी प्राणी श्रीकृष्ण की जय-जयकार करने लगे। बालक कृष्ण द्वारा चाणूऔर केशी का वध होना कंस के लिए अत्यंत हृदय विदारक था। अतः उसने सैनिकों को बुलाकर उन्हें आज्ञा दी कि तुम सभी अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर कृष्ण से युद्ध करो।
हे इंद्र! उसी क्षण श्रीकृष्ण ने गरुड़, बलराम तथा सुदर्शन चक्र का ध्यान किया, जिसके परिणामस्वरूप बलदेवजी सुदर्शन चक्र लेकर गरुड़ पर आरूढ़ होकर आए। उन्हें आता देख बालक कृष्ण ने सुदर्शन चक्र को उनसे लेकर स्वयं गरुड़ की पीठ पर बैठकर न जाने कितने ही राक्षसों और दैत्यों का वध कर दिया, कितनों के शरीर अंग-भंग कर दिए। इस युद्ध में श्रीकृष्ण और बलदेव ने असंख्य दैत्यों का वध किया। बलरामजी ने अपने आयुध शस्त्र हल से और कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से माघ मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को विशाल दैत्यों के समूह का सर्वनाश किया।
जब अन्त में केवल दुराचारी कंस ही बच गया तो कृष्ण ने कहा- हे दुष्ट, अधर्मी, दुराचारी अब मैं इस महायुद्ध स्थल पर तुझसे युद्ध कर तथा तेरा वध कर इस संसार को तुझसे मुक्त कराऊँगा। यह कहते हुए श्रीकृष्ण ने उसके केशों को पकड़ लिया और कंस को घुमाकर पृथ्वी पर पटक दिया, जिससे वह मृत्यु को प्राप्त हुआ। कंस के मरने पर देवताओं ने शंखघोष व पुष्पवृष्टि की। वहां उपस्थित समुदाय श्रीकृष्ण की जय-जयकाकर रहा था। कंस की मृत्यु पर नंद, देवकी, वसुदेव, यशोदा और इस संसार के सभी प्राणियों ने हर्ष पर्व मनाया।

2. विधि
इस कथा को सुनने के पश्चात इंद्र ने नारदजी से कहा- हे ऋषि इस कृष्ण जन्माष्टमी का पूर्ण विधान बताएं एवं इसके करने से क्या पुण्य प्राप्त होता है, इसके करने की क्या विधि है?
नारदजी ने कहा- हे इंद्र! भाद्रपद मास की कृष्णजन्माष्टमी को इस व्रत को करना चाहिए। उस दिन ब्रह्मचर्य आदि नियमों का पालन करते हुए श्रीकृष्ण का स्थापन करना चाहिए। सर्वप्रथम श्रीकृष्ण की मूर्ति स्वर्ण कलश के ऊपर स्थापित कर चंदन, धूप, पुष्प, कमलपुष्प आदि से श्रीकृष्ण प्रतिमा को वस्त्र से वेष्टित कर विधिपूर्वक अर्चन करें। गुरुचि, छोटी पीतल और सौंठ को श्रीकृष्ण के आगे अलग-अलग रखें। इसके पश्चात भगवान विष्णु के दस रूपों को देवकी सहित स्थापित करें।
हरि के सान्निध्य में भगवान विष्णु के दस अवतारों, गोपिका, यशोदा, वसुदेव, नंद, बलदेव, देवकी, गायों, वत्स, कालिया, यमुना नदी, गोपगण और गोपपुत्रों का पूजन करें। इसके पश्चात आठवें वर्ष की समाप्ति पर इस महत्वपूर्ण व्रत का उद्यापन कर्म भी करें।
यथाशक्ति विधान द्वारा श्रीकृष्ण की स्वर्ण प्रतिमा बनाएँ। इसके पश्चात मत्स्य कूर्म इस मंत्र द्वारा अर्चनादि करें। आचार्य ब्रह्मा तथा आठ ऋत्विजों का वैदिक रीति से वरण करें। प्रतिदिन ब्राह्मण को दक्षिणा और भोजन देकर प्रसन्न करें।

2.1. विधि पूर्ण विधि
उपवास की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। उपवास के दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएँ। पश्चात सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्‌पति, भूमि, आकाश, खेचर, अमर और ब्रह्मादि को नमस्काकर पूर्व या उत्तर मुख बैठें। इसके बाद जल, फल, कुश और गंध लेकर संकल्प करें-
ममाखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये॥
अब मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकीजी के लिए सूतिकागृह नियत करें। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। मूर्ति में बालक श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श किए हों अथवा ऐसे भाव हो। इसके बाद विधि-विधान से पूजन करें। पूजन में देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी इन सबका नाम क्रमशः निर्दिष्ट करना चाहिए।
फिर निम्न मंत्र से पुष्पांजलि अर्पण करें- प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामनः। वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नमः। सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तु ते।
अंत में प्रसाद वितरण कर भजन-कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण करें।

3. उद्देश्य
जो व्यक्ति जन्माष्टमी के व्रत को करता है, वह ऐश्वर्य और मुक्ति को प्राप्त करता है। आयु, कीर्ति, यश, लाभ, पुत्र व पौत्र को प्राप्त कर इसी जन्म में सभी प्रकार के सुखों को भोग कर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है। जो मनुष्य भक्तिभाव से श्रीकृष्ण की कथा को सुनते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। वे उत्तम गति को प्राप्त करते हैं।

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निर्मल आश्रम में कृष्ण जन्माष्टमी पर होंगे सत्संग कार्यक्रमस्थानीय छप्पर पाड़ा स्कूल के पीछे स्थित निर्मल आश्रम में कृष्ण जन्माष्टमी पर भव्य आध्यात्मिक सत्संग समेत कई. इस अवसर पर कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा होगी।. कृष्णा जन्माष्टमी व्रत कथा पूजन विधि. इसके बाद श्री कृष्ण के जन्म की कथा सुनी जाती है। Author जनसत्ता ऑनलाइन नई दिल्ली Updated: August 24, 2019 5:16 PM. Janmashtami 2019: जन्माष्टमी व्रत कथा और पूजा विधि। Krishna Janmashtami 2019 Vrat Vidhi, Katha, Process: कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व हिंदू धर्म. Janmashtami vrat and sri krishna janma katha जन्माष्‍टमी. शनिवार व्रत कथा और पूजा विधि शनिवार को शनिदेव जी का दिन होता है शनि जो कि बहुत ही न्यायप्रिय देवता हैं और जो जैसा कर्म करता है. श्री जन्माष्टमी व्रत कथा पूर्ण विधि उपवास की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।. कृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि, भोग, व्रत Deepawali. श्री कृष्ण जन्मोत्सव पूरे देश में उत्साह से मनाया जाता है। हर साल भाद्र माह की अष्टमी तिथि को जन्माष्टमी मनाई जाती है। यह सभी व्रतों में सबसे उत्तम व्रत माना जाता है। जन्माष्टमी की तिथि को लेकर पहले भी उलझन की स्थिति. Janmashtami 2019 जन्माष्टमी कब है 2019 में हरिभूमि. Navratri 2019: नवरात्रि के व्रत में इन नियमों का करें पालन, मां दुर्गा की आप पर बरसेगी कृपा. Navaratri 2019: Do not do this work even by mistake in Janmashtami 2019 जन्‍माष्‍टमी के दिन बांसुरी की पूजा करने से मिलेंगे ये लाभ. Janmashtami 2019: Janmashtami Puja Vidhi,.

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जन्माष्टमी व्रत कथा. श्रीकृष्ण जन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: इस उपवास की महिमा है अपरम्पार प्रेगनेंसी में करवा चौथ व्रत रखने के प्रेगनेंसी म प्रेगनेंसी में होने वाली छोटी मोटी परेशानियों दूसरी बार डै दूसरी बार डैड बनने की ख्वाहिश. आखिर क्यों कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत है Amar Ujala. अष्टमी दो प्रकार की है पहली जन्माष्टमी और दूसरी जयंती। इसमें केवल पहली अष्टमी है। स्कन्दपुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है।. जन्माष्टमी व्रत कथा Indian Spiritual. हर वर्ष भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है। वर्ष 2020 में जन्माष्टमी का पर्व 11 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन व्रत रखा जाता है। व्रत के अंत में मध्यरात्रि को जन्माष्टमी व्रत कथा और भगवान कृष्ण के. जन्माष्टमी व्रत कथा BookStruck. Krishna Janmashtami Vrat Katha कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा Chaturthi Vrat Katha Happy Ganesh Chaturthi 2019 Motor Vehicles ​Amendment Act 2019 What is a good color for a bedroom? Bedroom Color as per Vastu. शुक्रवार कैसे करें संतोषी माता का व्रत, जानिए पूजन विधि, कहानी.

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इंद्र ने कहा है हे ब्रह्मपुत्र, हे मुनियों में श्रेष्ठ, सभी शास्त्रों के ज्ञाता, हे देव, व्रतों में उत्तम उस व्रत को बताएँ, जिस व्रत से मनुष्यों को मुक्ति, ला. जन्माष्टमी व्रत पंजाब केसरी. कृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि, भोग, व्रत महत्व एवं बधाई कविता 2019 Krishna Janmashtami, Dahi Handi Gokulashtami Pooja Vidhi, vrat mahtva, Kavita जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण का जन्म दिवस के रूप मे पूरे भारत मे बहुत ही उत्साह के साथ मनाई जाती है. जन्माष्टमी व्रत कथा, श्रीकृष्ण ज्ञानवर्षा. कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर मथुरा, द्वारका और दिल्ली के मंदिरों में श्रद्धालु की भीड़ उमड़ी हुई है. जन्माष्टमी कैसे मनाएँ? असीम भगवत्कृपा कैसे. गोविंद मिश्र रात्रि 10 से 11 बजे तक श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा का पाठ करेंगे। मध्य रात्रि 12 बजे 31 तोपों की सलामी होगी तथा विशेष आतिशबाजी की जाएगी। रात्रि 12 बजे अभिषेक के लिए दर्शन खुलेंगे। 6 पंडित वेद पाठ करेंगे। अभिषेक के लिए 425. इस बार 2 दिन मनाई जाएगी जन्‍माष्‍टमी Hindi News. 23 अगस्त को उपवास जन्मोत्सव का शुभ मुहूर्त व्रत एवं पूजा की संपूर्ण विधि श्री कृष्ण जन्माष्टमी इस बार 23 व 24 अगस्त को शुक्रवार. का व्रत निर्विवाद रूप से 23 अगस्‍त को है. यह भी पढ़ें: जन्‍माष्‍टमी की पूजा विधि, व्रत कथा और महत्‍व.

जन्माष्टमी भगवान कृष्ण और आठ का ये है संयोग.

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव है, त्योहार है। भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी कंस का संहार करने के लिए मथुरा के कारागार में मध्यरात्रि को जन्म लिया था।. साधना विधि एवं मंत्र Archives SHRI. श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा एवं विधि श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत विधि उपवास की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य. जन्माष्टमी व्रत कथा Grehlakshmi. उपवास के बारे में मुख्य लेख जन्माष्टमी व्रत कथा. अष्टमी दो प्रकार की है पहली जन्माष्टमी और दूसरी जयंती। इसमें केवल पहली अष्टमी है। स्कन्द पुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता,. श्री कृष्ण जन्माष्टमी 2020 पूजा विधि पूजन. वैसे तो जन्‍माष्‍टमी के व्रत के समय पर कोई मतभेद नहीं है लेकिन फिर भी कुछ लोग मध्‍यरात्रि पर रोहिणी नक्षत्र होने पर व्रत रखते हैं जो कि सप्‍तमी एवं अष्‍मी का व्रत Pradosh Vrat: प्रदोष व्रत में शिवपूजा से मिलता है ऐसा वरदान, जानिए कथा. 101 Best kartik katha in hindi images in 2020 Lord vishnu. कृष्ण जन्माष्टमी 2020 का महत्व पूजा विधि व्रत कथा राधा कृष्ण की मथुरा में रचाई रास लीला और जाने नन्द लाल ने क्या किया गोपियों कृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि व्रत कथा.

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जन्माष्टमी के व्रत की तारीख को लेकर इस बार उलझन. Highlightsभगवान कृष्ण के जन्मदिन को जन्माष्टमी के तौपर मनाया जाता है हर साल भाद्र महीने की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है जन्माष्टमीजन्माष्टमी इस साल कब मनाई जाएगी, इसे लेकर. जन्माष्टमी मेवा पाग बनाने की विधि Mewa Pag. अहोई अष्टमी व्रत कथा और अहोई अष्टमी की कहानी Ahoi Ashtami Vrat Vidhi and Story of Ahoi Ashtami in Hindi. भारत पूरे विश्वभर में अपनी अनोखी संस्कृति व परम्पराओं के लिए जाना जाता है। यह देश त्योहारों का देश है और यह सभी त्योहार हमारे संस्कारों तथा​. जन्‍माष्‍टमी, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि StarsTell. इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल जन्माष्टमी कह देने मात्र से भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव का पंडित मनोज शुक्ला ने बताया ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार सप्तमी युक्त अष्टमी का व्रत नही रखना चाहिये। संपूर्ण दिन भगवान की कथा, विष्णु सहस्र नाम स्तोत्र का पाठ तथा श्रीमद् भागवत महापुराण के श्री कृष्ण अवतार की कथा.

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कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा. कथा. इंह ने कहा हे मुनियों में श्रेष्ठ! इस व्रत को बता जिस व्रत में मनुष्यों को मुक्ति, लाभ प्राप्त हों तथा. भोग व मोक्ष भी प्राप्त हो जाए। इंद्र की बातों को सुनकर नारद जी ने कहा जेता युग के अन्त में और. द्वापर. जन्माष्टमी पर कथा जरूर सुनें और व्रत में इन बातों. Janmashtami 2019 जन्माष्टमी कब है 2019 में, जानें शुभ मूहू्र्त​, महत्व, पूजा विधि और जन्माष्टमी कथा जन्माष्टमी का व्रत अष्टमी तिथि से प्रांरभ होता है और नवमी तिथि पर व्रत का पारण किया जाता है। 2.जन्माष्टमी का व्रत करने वाले. श्री कृष्ण जन्माष्टमी जन्मोत्सव का शुभ AstroAge. News:जन्माष्टमी पर कथा जरूर सुनें और व्रत में इन बातों का ध्यान भी रखें Media Passion Chhattisgarh Hindi News.

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Janmashtami 2019: 23 या 24 अगस्‍त, किस दिन रखें जन्‍माष्‍टमी व्रत? जानें Happy Janmashtami 2019: जन्‍माष्‍टमी पर अपनों को भेजें ये Messages, दें शुभकामनाएं… अब ये कहा जा रहा है कि अष्‍टमी तिथि 23 अगस्‍त को होने से इस दिन व्रत रखा जाना चाहिए. Jaya Ekadashi 2020: राजा हरिश्‍चंद्र ने कष्‍टों से मुक्ति को रखा था ये व्रत, पढ़ें जया एकादशी की पौराणिक व्रत कथा. जन्माष्टमी 2019 कब है, श्री कृष्ण जन्माष्टमी कथा. जन्माष्टमी व्रत कथा Janmashtami Fast Story. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत पूजन कैसे करें, 10 जरूरी. आइए जानते हैं कि 2026 में जन्माष्टमी कब है व जन्माष्टमी 2026 की तारीख व मुहूर्त। जन्माष्टमी का अष्टमी पहले ही दिन आधी रात को विद्यमान हो तो जन्माष्टमी व्रत पहले दिन किया जाता है। 2. अष्टमी केवल जन्माष्टमी कथा. द्वापर युग. कौन सा मुहूर्त है कृष्णा पूजा के लिए शुभ, जानिये. व्रत कथा कोष. संग्रहकर्ता परम पूज्य श्री १०८ गराधराचार्य कन्यसागरजी महाराज. प्रकाशन संयोजक इस व्रत कथा कोष के संग्रह करने में मैंने ब्रत कथा कोष सरत, नत तिथि निर्णय जन्माष्टमी, महावीरजयंती, क्रिसमसडे, गुडझायडे.

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पुरानी कथाओं के मुताबिक भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था। इस बार जन्माष्टमी 23 अगस्त को मनाया जा रहा है तो वहीं कई जगहों पर 24 अगस्त को मनाया जा रहा है। आइए जानते हैं कृष्ण जन्माष्टमी का. Janmashtami 2019 Vrat Katha, Puja Vidhi in Hindi: जन्माष्टमी. जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म कथा को सुनने और कहने का पुण्य बहुत होता है। यदि आप संकट में हों तो कान्हा के जन्म कथा को जरूर पढ़ें।.

निर्मल आश्रम में कृष्ण जन्माष्टमी पर होंगे.

कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव! August 10, 2018. Add Comment. अगस्त के महीने में रक्षाबंधन के बाद सितंबर के पहले हफ्ते में ही कृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार धूमधाम से पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है। इस वर्ष कृष्ण. कृष्ण जन्माष्टमी 2020 का महत्व पूजा विधि व्रत कथा. इतिहास. भगवान श्रीकृष्ण के रूप माना और उनकी पूजा होती हैं। मान्यता है कि भगवान कृष्ण मानव जीवन के सभी चक्रों यानि जन्म, मृत्यु, शोक, खुशी आदि से गुजरे हैं, इसीलिए उन्हें पूर्णावतार कहा जाता है। भविष्य पुराण के अनुसार भाद्रपद माह की.

कृष्णा जन्माष्टमी 2019.

जानकारों के मुताबिक जन्‍माष्‍टमी के दिन व्रत रखने वालों को अष्‍टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के खत्‍म होने के बाद व्रत का पारण करना चाहिए। अगर दोनों का संयोग नहीं हो पा रहा आनंद ​मंगल का संदेश देता है। श्रीकृष्‍ण के जन्‍म की कथा. श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पौराणिक कथा. जन्माष्टमी के व्रत को करना अनिवार्य माना जाता है और विभिन्न धर्मग्रंथों में कहा गया है कि जब तक उत्सव सम्पन्न हो जाए तब तक भोजन कदापि न करें। व्रत के दौरान फलाहार लेने में कोई मनाही नहीं है।.