अवतारवाद

संसार के भिन्न-भिन्न देशों तथा धर्मों में अवतारवाद धार्मिक नियम के समान आदर और श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। पूर्वी और पश्चिमी धर्मों में यह सामान्यत: मान्य तथ्य के रूप में स्वीकृत किया गया है।

1. हिंदू धर्म में अवतारवाद
अवतारवाद की हिन्दू धर्म में विशेष प्रतिष्ठा है। अत्यंत प्राचीन काल से वर्तमान काल तक यह उस धर्म के आधारभूत मौलिक सिद्धांतों में अन्यतम है। अवतार का शब्दिक अर्थ है - भगवान का अपनी स्वातंत्रय शक्ति के द्वारा भौतिक जगत् में मूर्तरूप से आविर्भाव होना, प्रकट होना। अवतार तत्व का द्योतक प्राचीनतम शब्द प्रादुर्भाव है। श्रीमद्भागवत में व्यक्ति शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। १०.२९.१४। वैष्णव धर्म में अवतार का तथ्य विशेष रूप से महत्वशाली माना जाता है, क्योंकि विष्णु या नारायण के पर, व्यूह, विभव, अंतर्यामी तथा अर्चा नामक पंचरूपधारण का सिद्धांत पांचरात्र का मौलिक तत्व है। इसीलिए वैष्णवजन भगवान के इन नाना रूपों की उपासना अपनी रुचि तथा प्रीति के अनुसार अधिकतर करते हैं। शैवमत में भगवान शंकर की नाना लीलाओं का वर्णन मिलता है। देखें, नीलकंठ दीक्षित का शिवलीलार्णव काव्य परंतु भगवान् शंकर तथा भगवती पार्वती के मूल रूप की उपासना ही इस मत में सर्वत्र प्रचलित है।

1.1. हिंदू धर्म में अवतारवाद नैतिक संतुलन
ऋत की स्थिति रहने पर ही जगत की प्रतिष्ठा बनी रहती है और इस संतुलन के अभाव में जगत् का विनाश अवश्यंभावी है। सृष्टि के रक्षक भगवान इस संतुलन की सुव्यवस्था में सदैव दत्तचित्त रहते हैं। ऋत के स्थान पर अनृत की, धर्म के स्थान पर अधर्म की जब कभी प्रबलता होती है, तब भगवान का अवतार होता है। साधु का परित्राण, दुर्जन का विनाश, अधर्म का नाश तथा धर्म की स्थापना इस महनीय उद्देश्य की पूर्ति के लिए भगवान अवतार धारण कहते है। गीता का यह श्लोक अवतारवाद का महामंत्र माना जाता है ४.४:
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्टकृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।
परंतु ये उद्देश्य भी अवतार के लिए गौण रूप ही माने जाते हैं। अवतार का मुख्य प्रयोजन इससे सर्वथा भिन्न है। सर्वैश्यर्वसंपन्न, अपराधीन, कर्मकालादिकों के नियामक तथा सर्वनिरपेक्ष भगवान के लिए दुष्टदलन और शिष्टरक्षण का कार्य तो इतर साधनों से भी सिद्ध हो सकता है, तब भगवान के अवतार का मुख्य प्रयोजन श्रीमद्भागवत १०.२९.१४ के अनुसार कुछ दूसरा ही है:
नृणां नि:श्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवती भुवि। अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणास्य गुणात्मन:।।
मानवों को साधन निरपेक्ष मुक्ति का दान ही भगवान के प्राकट्य का जागरूक प्रयोजन है। भगवान स्वत: अपने लीलाविलास से, अपने अनुग्रह से, साधकों को बिना किसी साधना की अपेक्षा रखते हुए, मुक्ति प्रदान करते हैं-अवतार का यही मौलिक तथा प्रधान उद्देश्य है।
पुराणों में अवतारवाद का हम विस्तृत तथा व्यापक वर्णन पाते हैं। इस कारण इस तत्व की उद्भावना पुराणों की देन मानना किसी भी तरह न्याय्य नहीं है। वेदों में हमें अवतारवाद का मौलिक तथा प्राचीनतम आधार उपलब्ध होता है। वेदों के अनुसार प्रजापति ने जीवों की रक्षा के लिए तथा सृष्टि के कल्याण के लिए नाना रूपों को धारण किया। मत्स्यरूप धारण का संकेत मिलता है शतपथ ब्राह्मण में २.८.१। १, कूर्म का शतपथ ७.५.१.५ तथा जैमिनीय ब्राह्मण ३। २७२ में, वराह का तैत्तिरीय संहिता ७.५.१.१ तथा शतपथ १४.१.२.११ में नृसिंह का तैत्तिरीय आरण्यक में तथा वामन का तैत्तिरीय संहिता २.१.३.१ में शब्दत: तथा ऋग्वेद में विष्णुओं में अर्थत: संकेत मिलता है। ऋग्वेद में त्रिविक्रम विष्णु को तीन डगों द्वारा समग्र विश्व के नापने का बहुश: श्रेय दिया गया है एको विममे त्रिभिरित् पदेभि:-ऋग्वेद १.१५४.३। आगे चलकर प्रजापति के स्थान पर जब विष्णु में इस प्रकार अवतारों के रूप, लीला तथा घटनावैचित्रय का वर्णन वेद के ऊपर ही बहुश: आश्रित है।
भागवत के अनुसार सत्वनिधि हरि के अवतारों की गणना नहीं की जा सकती। जिस प्रकार न सूखनेवाले अविदासी तालाब से हजारों छोटी छोटी नदियाँ कुल्या निकलती हैं, उसी प्रकार अक्षरय्य सत्वाश्रय हरि से भी नाना अवतार उत्पन्न होते हैं-अवतारा हासंख्येया हरे: सत्वनिधेद्विजा:। यथाऽविदासिन: कुल्या: सरस: स्यु: सहस्रश:। पाँचरात्र मत में अवतार प्रधानत: चार प्रकार के होते हैं-व्यूह संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध, विभव, अंतर्यामी तथा अर्यावतार। विष्णु के अवतारों की संख्या २४ मानी जाती है श्रीमद्भागवत २.६, परंतु दशावतार की कल्पना नितांत लोकप्रिय है जिनकी प्रख्यात संज्ञा इस प्रकार है-दो पानीवाले जीव वनजौ, मत्स्य तथा कच्छप, दो जलथलचारी वनजौ, वराह तथा नृसिंह, वामन खर्व, तीन राम परशुराम, दाशरथि राम तथा बलराम, बुद्ध सकृप: तथा कल्कि अकृप:-
वनजौ वनजौ खर्वस्त्रिरामी सकृपोऽकृप:। अवतारा दशैवेते कृष्णास्तु भगवान स्वयम्।।
महाभारत में दशावतार में बुद्ध को छोड़ दिया गया है और हँस को अवतार मानकर संख्या की पूर्ति की गई है। भागवत के अनुसार बलराम की दशावतार में गणना हें, क्योंकि श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान ठहरे। वे अवतार नहीं, अवतारी हैं; अंश नहीं, अंशी हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार परमेश्वर प्रकृति और प्रकृतिजन्य कार्य का नियमन प्रवर्तनादि कार्य करते हैं और माया से मुक्त रहते हुए भी माया से संबद्ध प्रतीत होते हैं एवं सर्वदा चिच्छक्तितयुक्त होकर पुरुष कहलाते हैं जिनसे भिन्न भिन्न अवतारों की अभिव्यक्ति होती है। इस प्रकार अवतारों के भेद हैं--पुरुषावतार, गुणावतार, कल्पावतार, मन्वंतरावतार, युगावतार, स्व्ल्पावतार, लीलावतारआदि। कहीं कहीं आवेशावतार आदि की भी चर्चा मिलती है, जैसे परशुराम। इस प्रकार अवतारों की संख्या तथा संज्ञा में पर्याप्त विकास हुआ है। उपर्युक्त विवेचन के आधापर यह कहा जा सकता है कि अवतार वस्तुत: परमेश्वर का वह आविर्भाव है जिसमें वह किसी विशेष उद्देश्य को लेकर किसी विशेष रूप में, किसी विशेष देश और काल में, लोकों में अवतरण करता है।

2. बौद्ध तथा अन्य धर्म
बौद्ध धर्म के महायानपंथ में अवतार की कल्पना दृढ़ मूल है। बोधिसत्व कर्मफल की पूर्णता होने पर बुद्ध के रूप में अवतरित होते हैं तथा निर्वाण की प्राप्ति के अनंतर बुद्ध भी भविष्य में अवतार धारण करते हैं यह महायानियों की मान्यता है। बोधिसत्व तुषित नामक स्वर्ग में निवास करते हुए अपने कर्मफल की परिपक्वता की प्रतीक्षा करते हैं और उचित अवसर आने पर वह मानव जगत में अवतीर्ण होते हैं। थेरवादियों में यह मान्यता नहीं है। बौद्ध अवतारतत्व का पूर्ण निदर्शन हमें तिब्बत में दलाईलामा की कल्पना में उपलब्ध होता है। तिब्बत में दलाईलामा अवलोकितेश्वर बुद्ध के अवतार माने जाते हैं। तिब्बती परंपरा के अनुसार ग्रेदैन द्रुप १४७३ ई. नामक लामा ने इस कल्पना का प्रथम प्रादुर्भाव किया जिसके अनुसार दलाईलामा धार्मिक गुरु तथा राजा के रूप में प्रतिष्ठित किए गए। ऐतिहासिक दृष्टि से लोजंग-ग्या-मत्सो १६१५-१६८२ ई. नामक लामा ने ही इस परंपरा को जन्म दिया। तिब्बती लोगों का दृढ़ विश्वास है कि दलाईलामा के मरने पर उनकी आत्मा किसी बालक में प्रवेश करती है जो उस मठ के आसपास ही जन्म लेता है। इस में अवतार की कल्पना मान्य नहीं थी। चीनी लोगों का पहला राजा शंगती सदाचाऔर सद्गुण का आदर्श माना जाता था, परंतु उसके ऊपर देवत्व का आरोप कहीं भी नहीं मिलता।
पारसी धर्म में अनेक सिद्धांत हिंदुओं और विशेषत: वैदिक आर्यों के समान हैं, परंतु यहाँ अवतार की कल्पना उपलब्ध नहीं है। पारसी धर्मानुयायियों का कथन है कि इस धर्म के प्रौढ़ प्रचारक या प्रतिष्ठापक जरथुस्त्र अहुरमज्द के कहीं भी अवतार नहीं माने गए हैं। तथापि ये लोग राजा को पवित्र तथा दैवी शक्ति से संपन्न मानते थे। ह्रेनारह नामक अद्भूत तेज की सत्ता मान्य थी, जिसकाप निवास पीछे अर्दशिर राजा में तथा सस्नवंशी राजाओं में था, ऐसी कल्पना पारसी ग्रंथों में बहुश: उपलब्ध है। सामी सेमेटिक लोगों में भी अवतारवाद की कल्पना न्यूनाधिक रूप में विद्यमान है। इन लोगों में राजा भौतिक शक्ति का जिस प्रकार चूडांत निवास था उसी प्रकार वह दैवी शक्ति का पूर्ण प्रतीक माना जाता था। इसलिए राजा को देवता का अवतार मानना यहाँ स्वभावत: सिद्ध सिद्धांत माना जाता था। प्राचीन बाबुल बेबिलोनिया में हमें इस मान्यता का पूर्ण विकास दिखाई देता है। किश का राजा उरुमुश अपने जीवनकाल में ही ईश्वर का अवतार माना जाता था। नरामसिन नामक राजा अपने में देवता का रक्त प्रवाहित मानात था इसलिए उसने अपने मस्तक पर सींग से युक्त चित्र अंकित करवा रखा था। वह अक्काद का देवता नाम से विशेष प्रख्यात था।
मिस्री मान्यता भी कुछ ऐसी ही थी। वहाँ के राजा फराऊन नाम से विख्यात थे जिन्हें मिस्री लोग दैवी शक्ति से संपन्न मानते थे। मिस्रनिवासी यह भी मानते थे कि रा नामक देवता रानी के साथ सहवास कर राजपुत्र को उत्पन्न करता है, इसीलिए वह अलौकिक शक्तिसंपन्न होता है। यहूदी भी ईश्वर के अवतार मानने के पक्ष में हैं। बाइबिल में स्पष्टत: उल्लेख है कि ईश्वर ही मनुष्य का रूप धारण करता है और इसके पर्याप्त उदाहरण भी वहाँ उपलब्ध होते हैं। यूनानियों में अवतार की कल्पना आर्यो के समान नहीं थी परंतु वीर पुरुष विभिन्न देवों के पुत्ररूप माने जाते थे। प्रख्यात योद्धा हरक्यूलीज ज्यूस का पुत्र माना जाता था, लेकिन देवता के मनुष्यरूप में पृथ्वी पर जन्म लेने की बात यूनान में मान्य नहीं थी।
इसलाम के शिया संप्रदाय में अवतार के समान सिद्धांत का प्रचार है। शिया लोगों की यह मान्यता कि अली मुहम्मद साहब के चचेरे भाई तथा फ़ातिमा मुहम्मद साहब की पुत्री के वंशजों में ही धर्मगुरु खलीफ़ा बनने की योग्यता विद्यमान है, अवतार के पास तक पहुँचती है। इमा की कल्पना में भी यह तथ्य जागरूक जा सकता है। वे मुहम्मद साहब के वंशज ही नहीं, प्रय्तुत उनमें दिव्य ज्योंति की भी सत्ता है और उनकी श्रेष्ठता का यही कारण है।

3. ईसाई धर्म
आधारभूत विश्वास है कि ईश्वर मनुष्य जाति के पापों का प्रायश्चित्त करने तथा मनुष्यों को मुक्ति के उपाय बताने के उद्देश्य से ईसा में अवतरित हुआ।
बाइबिल के निरीक्षण से पता चलता है कि किस प्रकार ईसा के शिष्य उनके जीवनकाल में ही धीरे-धीरे उनके ईश्वरत्व पर विश्वास करने लगे। इतिहास इसका साक्षी है कि ईसा के मरण के पश्चात् अर्थात् ईसाई धर्म के प्रारंभ से ही ईसा को पूर्ण रूप से ईश्वर तथा पूर्ण रूप से मनुष्य भी माना गया है। इस प्रारंभिक अवतारवादी विश्वास के सूस्रीकरण में उत्तरोत्तर स्पष्टता आती गई है। वास्तव में अवतारवाद का निरूपण विभिन्न-विभिन्न भ्रांत धारणाओं के विरोध से विकसित हुआ। उस विकास के सोपान निम्नलिखित हैं:
१ बाइबिल में अवतारवाद का सुव्यवस्थित प्रतिपादन नहीं मिलता, फिर भी इसमें ईसाई अवतारवाद के मूलभूत तत्व विद्यमान हैं। एक ओर, ईसा का वास्तविक मनुष्य के रूप में चित्रण हुआ है-उनका जन्म और बचपन, तीस वर्ष की उम्र तक बढ़ई की जीविका, दु:खयोग और मरण, यह सब ऐसे शब्दों में वर्णित है कि पाठक के मन में ईसा के मनुष्य होने के विषय में संदेह नहीं रह जाता। दूसरी ओर, ईसा ईश्वर के अवतार के रूप में भी चित्रित हैं। तत्संबंधी शिक्षा समझने के लिए ईश्वर के स्वरूप के विषय में बाइबिल की धारणा का परिचय आवश्यक है। इसके अनुसार एक ही ईश्वर में, एक ही ईश्वरी तत्व में तीन व्यक्ति हैं-पिता, पुत्और आत्मा; तीनों समान रूप से अनादि और अनंत हैं विशेष विवरण के लिए देखिए, त्रित्व। बाइबिल में इसका अनेक स्थलों पर स्पष्ट शब्दों में उल्लेख हुआ है कि ईसा ईश्वर के पुत्र हैं, जो पिता की भांति पूर्ण रूप से ईश्वरीय है।
२ प्रथम तीन शताब्दियों में बाइबिल के इस अवतारवाद के विरुद्ध कोई महत्वपूर्ण आंदोलन उत्पन्न नहीं हुआ। अनेक भ्रांत धाराणाओं का प्रवर्तन अवश्य हुआ था, किंतु उनमें से कोई भी धारण आधिक समय तक प्रचलित नहीं रह सकी। प्रथम शताब्दी में दो परस्पर विरोधी वादों का प्रतिपादन किया गया था-एबियोनितिस्म के अनुसार ईसा ईश्वर नहीं थे और दोसेतिस्म के अनुसार वह मनुष्य नहीं थे। दोसेतिस्म का अर्थ है प्रतीयमानवाद, क्योंकि इस वाद के अनुसार ईसा मनुष्य के रूप में दिखाई तो पड़े, किंतु उनकी मानवता वास्तविक ने होकर प्रतीयमान मात्र थी। उक्त मतों के विरोध में काथलिक धर्मतत्वज्ञ बाइबिल के उद्धरण देकर प्रमाणित करते थे कि ईसाई धर्म के सही विश्वास के अनुसार ईसा में ईश्वरत्व तथा मनुष्यत्व दोनों ही विद्यमान थे।
३ चौथी शताब्दी ई. में आरियस ने त्रित्व और अवतारवाद के विषय में एक नया मत प्रचलित करने का सफल प्रयास किया जिससे बहुत समय तक समस्त ईसाई संसार में अशांति व्याप्त रही। आरियस के अनुसार ईश्वर का पुत्र तो ईसा में अवतरित हुआ किंतु पुत्र ईश्वरीय न होकर पिता की सृष्टि मात्र है देखिए, अरियस। इस शिक्षा के विरोध में ईसाई गिरजे की प्रथम महासभा ने घोषित किया- पिता और पुत्र तत्वत: एक हैं अर्थात् दोनों समान रूप से ईश्वर हैं। इस महासभा का आयोजन ३२५ ई. में निसेया नामक नगर में हुआ था।
४ आरियस के बाद अपोलिनारिस ने ईसा के अपूर्ण मनुष्यत्व का सिद्धांत प्रतिपादित किया। उनके अनुसार ईसा के मानव शरीर तथा प्राणधारी जीव ऐनिमल सोल था, किंतु उनके बुद्धिसंपन्न आत्मा रैशनल सोल नहीं थी; ईश्वर का पुत्र मानवीय आत्मा का स्थान लेता था। कुस्तुंतुनिया की महासभा ने ३८१ ई. में अपोलिनारस के विरुद्ध घोषित किया कि ईसा के वास्तविक मानव शरीर में एक बुद्धिसंपन्न वास्तविक मानवीय आत्मा विद्यमान थी।
५ पाँचवीं शताब्दी में कुस्तुंतुनिया के बिशप नेस्तोरियस ने अवतारवाद संबंधी एक नई धारणा का प्रचार किया जिसके फलस्वरूप काथलिक गिरजे की तृतीय महासभा का आयोजन एफेसस में ४३१ ई. में हुआ था। नेस्तोरियस के अनुसार ईसा में दो व्यक्ति विद्यमान थे-एक मानव व्यक्ति था और एक ईश्वरीय व्यक्ति ईश्वर का पुत्र, जो ईश्वरीय स्वभाव से संपन्न था। अत: ईश्वर मनुष्य नहीं बना प्रत्युत उसने एक स्वत:पूर्ण मनुष्य में निवास किया है। एफेसस की महासभा ने नेस्तोरियस को पदच्युत किया तथा उनकी शिक्षा के विरोध में घोषित किया कि ईसा में केवल एक ही व्यक्ति अर्थात् ईश्वर का पुत्र विद्यमान है। अनादिकाल से ईश्वरीय स्वभाव से संपन्न होकर ईश्वर के पुत्र ने मानवीय स्वभाव शरीऔर आत्मा को अपना लिया और इस प्रकार एक ही व्यक्ति में ईश्वरत्व तथा मनुष्यत्व दोनों का संयोग हुआ।
६ नेस्तोरियस के मत के प्रतिक्रियास्वरूप कुछ विद्वानों ने ईसा में न केवल एक ही व्यक्ति प्रत्युत एक ही स्वभाव भी मान लिया है। इस वाद का नाम मोनोफिसितिस्म अर्थात् एकस्वभाववाद है; यूतिकेस इसका प्रवर्त्तक माना जाता है। इस वाद के अनुसार अवतरित होने के पश्चात् ईसा का ईश्वरत्व तथा मनुष्यत्व दोनों इस प्रकार एक हो गए कि एक नया स्वभाव, एक नवीन तत्व उत्पन्न हुआ, जो न पूर्ण रूप से ईश्वरीय और न पूर्णरूप से मानवीय था। दूसरों के अनुसार ईसा का मनुष्यत्व उनके ईश्वरत्व में पूर्णतया लीन हो गया जिससे ईसा में ईश्वरीय स्वभाव मात्र शेष रहा। इस एकस्वभाववाद के विरुद्ध चतुर्थ महासभा कालसेदोन, ४५९ ई. ने परंपरागत अवतारवाद की पूर्ण रक्षा करते हुए ठहराया कि ईसा में ईश्वरत्व और मनुष्यत्व दोनों अक्षुण्ण और पृथक् हैं।
७ बाद में एकस्वभाववाद का परिवर्तित रूप प्रचलित हुआ। यह नया वाद ईसा का ईश्वरत्व तथा मनुष्यत्व दोनों को स्वीकार करते हुए भी मानता था कि उनका मनुष्य पूर्णतया निष्क्रिय था, यहाँ तक कि उसमें मानवीय इच्छाशक्ति का भी अभाव था। ईसा का समस्त कार्य कलाप उनकी ईश्वरीय इच्छाशक्ति से प्रेरित था। इस मत के विरोध में कुस्तुंतुनिया की एक नई महासभा ने ६८० ई. ईसा का पूर्ण मनुष्यत्व प्रतिपादित करते हुए घोषित किया कि ईसा में ईश्वरीय इच्छाशक्ति तथा कार्यकलाप के अतिरिक्त एक मानवीय इच्छशक्ति तथा कार्यकलाप का पृथक् अस्तित्व था।
८ इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रारंभिक अवतारवादी विश्वास की पूर्ण रक्षा करते हुए इसके सैद्धांतिक सूत्रीकरण का शताब्दियों तक विकास होता रहा। अंततोगत्वा यह माना गया कि ईश्वर के पुत्र ने पूर्णतया ईश्वर रहते हुए मनुष्यत्व अपना लिया है, अत: एक ही ईश्वरीय व्यक्ति में दो स्वभावों का-ईश्वरत्व और मनुष्यत्व का संयोग हुआ। उनका मनुष्यत्व वास्तविक और पूर्ण था-एक ओर उनका शरीऔर उसका दु:ख वास्तविक था, दूसरी ओर उनकी मानवीय आत्मा की अपनी बुद्धि तथा इच्छाशक्ति का पृथक् अस्तित्व और सक्रियता थी। ईसाई अवतारवाद की प्राय: इन्कार्नेशन कहा जाता है; वास्तव में यह ईश्वर द्वारा मनुष्यत्व का ग्रहण ही है। उसका मानव रूप में प्रादुर्भाव।

4. सन्दर्भ ग्रन्थ
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  • स ख धर म ख लस य स खमत प ज ब ਸ ਖ 15व सद म भ रत य स त पर पर स न कल एक धर म ह ज सक श र आत ग र न नक द व न क थ इस धर म क अन य य य
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  • क ष ण ह व ष ण क अवत र भ रत य धर म और आस थ पर व श ष प रभ व रखत ह अवत रव द क भ वन व द क ह शतपथ और ऐतर य ब र ह मण म व ष ण क मत स य, क र म
  • मह न म लन व स र ज ओ क ब र म ज य द ज नक र क ल ए आप हम र ल ख अवत रव द क सच पढ सकत ह Bonfire truth About 3100 years before Christ
  • ल ए एक स य ग य वर ढ ढन क ल ए च न त त ह उठत ह व द क ऋच ओ म अवत रव द क स द ध न त क श रवण करन क पश च त, वह इस सम बन ध म च न तन कर रह ह
  • ह ल खक इस ब त क द हर त ह क परम श वर आत म ह और ब इब ल म नव करण और अवत रव द क जर ए ईश वर क प श करत ह ज क वल ईश वर क सम नत क दर शत ह God
  • न रद स प रश न और र म क अवत र ह न क सम बन ध म ज ज ञ स न रद अवत रव द सग ण और न र ग ण अवध रण ओ क स पष ट करण, कथन क स त र म क भक त ह

अवतारवाद Hindi translation of अवतारवाद K.

Purana discusses incarnation stories. पुराण साहित्य में अवतारवाद को प्रतिष्ठित किया गया है। 2. The theory of Avatars is established in Puranic literature पुराण साहित्य में अवतारवाद को प्रतिष्ठित किया गया है। 3. In Purana literature the concept of incarnation has been depicted a lot. अवतारवाद की परिकल्पना GyanApp. अवतारवाद क्या है? इसको ठीक से समझने की आवश्यकता है । अवतारवाद का अर्थ सही मायने में ये है कि हमने प्रभु को एक नाम एक शक्ल के रूप में जाना है और असली बात.

अवतारवाद क्या अद्वै Quotes & Writings by उदय.

Advective region. अभिवाही वायुमंडल. advective region. अभिवाही वायुमंडल. Advective thunder storm. अभिवहनी तड़ीत् झंझा अभिवाही तड़ित् झंझा. Adventism. अवतारवाद ईसाई धर्म का मत कि ईसामसीह का संसार में पुनः आगमन तथा संसार का अंत समीप है। देखिए ​advent. इकाई 6 अवतारवाद का समाजशास्त्और eGyanKosh. अवतार का अर्थ अवतरित होना या उतरना है। हिंदू मान्यता के अनुसार जब दुष्टों का भार पृथ्वी पर बढ़ता है और धर्म की हानि होती है तब पापियों का संहार करके भक्तों की रक्षा करने के लिये भगवान अपने अंश अथवा पूर्णांश से पृथ्वी पर शरीर धारण करते हैं।. Hindi information article पाखण्ड खंडिनी. वेदों में अवतारवाद!! वेद में अवतारवाद है या नहीं इसके लिए अवतारवाद के प्रतिपादक कुछ मन्त्र यहाँ लिखें जाते हैं प्रजपतिश्चरती गर्भे अंतरजायमानो बहुधा.

History: अवतारवाद का प्रथम उल्लेख निम्न में से.

अवतारवाद Avataravad meaning in English इंग्लिश मे मीनिंग is ANTHROPOMORPHISM अवतारवाद ka matlab english me ANTHROPOMORPHISM hai. Get meaning and translation of Avataravad in English language with grammar, synonyms and antonyms. Know the answer of question what is meaning of. लोगों के लिए सीख Images rajendra Ambedkar ShareChat. Displaying Results for हिन्दू अवतारवाद. जरूर पढ़ें. video गिर पड़े प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, video गिर पड़े प्रधानमंत्री. अवतारवाद अंग्रेजी हिंदी शब्दकोश रफ़्तार. Keyboard: Off Language: English. अवतारवाद avatAravAda Meaning in English. Noun. 1. the theory of incarnation. अवतारवाद meaning in Hindi, Meaning of अवतारवाद in English Hindi Dictionary. Pioneer by oli.​com, helpful tool of English Hindi Dictionary. Previous Word अवतारना Next Word अवतारित.

अवतारवाद का अन्त होगा? रामनिवास गुणग्राहक.

प्रश्नोत्तरी अवतारवाद विषय 1 प्रश्न अवतारवाद क्या है? उत्तर जब जीवात्माएँ पुनर्जन्म के अनुसार शरीर परिवर्तन करती हैं तो यह उनका अवतार लेना कहा जाता है । 2 प्रश्न क्या ईश्वर अवतार लेता है? उत्तर नहीं ईश्वर कभी भी. अनटाइटल्ड Shodhganga. गीता का अवतारवाद सिद्धान्त वेदों में यत्र तत्र अवतार की बातें हुई हैं । पुराणों में भी दशावतार का वर्णन है । जो गीता में आकर पूर्णता को प्राप्त हुआ है । इसी परिप्रेक्ष्य में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये योग मैंने विवस्वान. EZineMart: ऑनलाइन मैगज़ीन स्टोर, रीड डिजिटल. अवतार अवतारण अवतरण देहधारण अवतारवाद. Sentences. 1. Lord Krishna was the eightn incarnation of Lord Vishnu. श्री कृष्ण भगवान विष्णु के आठवें अवतार थे। 2. Afterwards hindu religion believes budh to be a vishnu incarnation. हिन्दू धर्म ने बाद में बुद्ध को विष्णु का एक अवतार. गीताधर्म और मार्क्सीवाद अवतारवाद BookStruck. संसार के भिन्न भिन्न देशों तथा धर्मों में अवतारवाद धार्मिक नियम के समान आदर और श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। पूर्वी और पश्चिमी धर्मों में यह सामान्यत: मान्य तथ्य के रूप में स्वीकृत किया गया है।. Incarnation meaning in Hindi incarnation in Hindi U Dictionary. अवतारवाद की अनिष्टकारी कल्पना जिसने भी कभी की होगी, तब उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन कोई भी यूँ ही मुँह उठाकर स्वयं को परमात्मा का अवतार घोषित कर देगा। अवतारवाद की अवधारणा चाहे जब से चली हो, लेकिन प्रतीत होता. Blogs 243468 Lookchup. अवतारवाद जातिवाद की आलोचना कैसे करता है पछतावा और गलतियों के बीच अंतर. बैडमिंटन में किन टीमों को अयोग्य घोषित Следующая Войти Настройки Конфиденциальность.

उद्भव – जीवन की उत्पत्ति – इंस्टी Einsty.

Adventism. अवतारवाद ईसाई धर्म का मत कि ईसामसीह का संसार में पुनः आगमन तथा संसार का अंत समीप है। देखिए advent. Adventitia. ବାହ୍ୟକଞ୍ଚୁକ, ବହିର୍ଖୋଳ. Adventitia. बाह्य कंचुक. adventitial. बाह्यस्थ, बाह्य​. adventitial. बाह्यस्थ, बाह्य. adventitial cell. बाह्यस्तर कोशिका. BBC Hindi भारत आज जैसे हालात में ही पैदा हुए थे. बड़ौत बागपत आचार्य सुभद्र मुनि महाराज ने कहा कि कोई आत्मा जब मोक्ष में जाकर सिद्ध हो जाती है, तो व. अवतारवाद Navbharat Times Readers Blog अपना ब्लॉग. अवतार - जब भी आप अवतारों और ईश्वर के जन्म की बात करते है तो उसका विरोध करने वाले तर्क देते है कि ये सिर्फ कल्पना है जिसका होना विज्ञान नकारता है । क्योंक. जैन धर्म में अवतारवाद का कोई स्थान नहीं आचार्य. Tag Archives: अवतारवाद. Harivansha हरिवंश बौद्ध धम्म, भारत, भारत विद्या, विमर्श, संस्कृतBy गिरिजेश राव December 18, 2017 3 Comments. पुराणों में ही उल्लिखित विविध पुराण श्लोक संख्याओं का अब उपलब्ध​.

अवतारवाद मीमांसा Avtarvad Mimansa E Pustakalaya.

हिन्दू धर्म के र्इश्वर कृत वेदो का एकेश्वरवाद कालान्तर से बहुदेववाद में खोया तो नही तथापि बहुदेववाद और अवतारवाद के बाद र्इश्वर को मुख्य से गौण बना दिया गया है। इसी प्रकार र्इसार्इयों की त्रिमूर्ति Trinity अर्र्थात् र्इश्वर, पुत्और आत्मा. Article अवतारवाद का सच The Arya Samaj. महाभारत में अवतारवाद मेरे शोध प्रबन्ध का विषय है । यह शोध प्रबन्ध सात अध्यायों में विभक्त है. प्रथम अध्याय अवतार की अवधारणा इसके अन्तर्गत अवतार शब्द की व्युत्पत्ति, स्वरूप, प्रयोजन, वैदिक साहित्य में अवतार एवं लौकिक. साहित्य में अवतार. ॥ वेदों में अवतारवाद!! वेद में Sanatana Dharma The. थे उत्तर वैदिक काल में हिंदू धर्म के अंतर्गत प्राकृतिक देवताओं की जगह ब्रह्मा विष्णु महेश जैसे त्रिमूर्ति शक्ति गणेश एवं आशावतारों की वृहत कल्पना की गई जिसके फलस्वरूप अवतारवाद की धारणा ने हिंदू मानस का संवर्धन एवं मानस अवतारवाद की.

अवतारवाद in English अवतारवाद English.

अवतारवाद अवतारों में विश्वास करने का सिद्धांत की परिभाषा. अवतारवाद जातिवाद की आलोचना कैसे करता है In.Net. Madhyakalin Sahitya me Avatarvadमध्याकालिन साहित्य में अवतारवाद. 0 reviews Write a review. Product Code: VRG 60. Author: Kapildev Pandey. Bound: Paper Back. Publishing Date: 1964. Publisher: Chowkhamba Vidyabhawan Varanasi. Pages: 1027. Language: Sanskrit & Hindi. Availability: 1. Rs. 300 Rs. अवतारवाद हिंदी शब्दकोश. A. महाभारत से. B. श्रीमदभागवतगीता से. C. रामायण से. D. उपनिषद से उत्तर है B. श्रीमदभागवतगीता से अवतारवाद का प्रथम उल्‍लेख भागवतगीता से माना जाता है । गीता में कृष्‍ण ने अर्जुन को बताया है कि स्‍वर्ग, नरक, अच्‍छा, बुरा, खट्टा,.

अवतारवाद और हिन्दू मानस लहू की जगह रगों में बहता.

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मध्यकालीन साहित्य में Avatarvadमध्याकालिन.

उदय प्रताप सिंह says, अवतारवाद क्या अद्वैत वेदान्त अवतारवाद को स्वीकार करता है? और अद्वैतब्रह्. Read the best original quotes, shayari, poetry & thoughts by उदय प्रताप सिंह on Indias fastest growing writing app YourQuote. Jutuk bü yJthJt fUt btirfU ytih Œtael ytth rbt ni WvtÆgtg Naidunia. अवतारवाद जातिवाद की आलोचना कैसे करता है पछतावा और गलतियों के बीच अंतर. बैडमिंटन में किन टीमों को अयोग्य घोषित. साहित्य परिषद शिवपुरी ने की लेखक प्रमोद भार्गव. यदि वह वेदों को जानते होते तो उन्हें ईश्वर के सत्यस्वरूप का ज्ञान अवश्य होता और वह अवतारवाद की अज्ञानपूर्ण व मिथ्या कल्पना न करते। अवतापर चर्चा करने से पूर्व ईश्वर के वैदिक व यथार्थ स्चरूप को जानना आवश्यक है। ईश्वर सत्य, चित्त.

डार्विनवाद से अवतारवाद तक श्रीकृष्ण परशुराम.

इतने लंबे विवरण के बाद अब मौका आता है कि हम अवतारवाद के संबंध में इन कर्मों को लगा के देखें कि कर्मवाद वहाँ किस प्रकार लागू होता है। यह तो कही चुके हैं कि समष्टि कर्मों के फलस्वरूप पृथिवी आदि पदार्थ बनते हैं जिनका ताल्लुएक दो से न हो के. Page 17 अंतरात्मा की आवाज Post by best bloggers in. ईश्वर इस संसार के स्थान विशेष वा काल विशेष में नहीं रहता परमेश्वर संसार के प्रत्येक स्थान में विद्यमान है। जो परमात्मा को एक स्थान विशेष पर मानते हैं वे बाल बुद्धि लोग हैं। वेद ने परमेश्वर को सर्वव्यापक कहा है। वेदानुकुल सभी शास्त्रों में. अवतारवाद avatAravAda meaning in English and Hindi AamBoli. को अपने दृष्टिकोण से रखने का प्रयत्न किया गया है पौराणिक दर्शन, अवतारवाद एवं वेद युगीन समाज से थोड़ा थोड़ा साहित्य प्रत्यक्ष और दृश्य शक्तियों की आराधना करना श्रेष्ठ है, ऐसा प्रयोजन उनका रहा होगा हालाँकि वह काल अवतारवाद का युग था.

हिन्दू धर्म और अवतारवाद लेख पंकज प्रखर Sahityapedia.

चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत को अवतारवाद के सिद्धांत से भी समझा जा सकता है जो की हिन्दुदर्शन शास्त्र में वर्णित है​। इस अवतारवाद के सिद्धांत की सहायता से जीवों के उद्भव और विकास को समझा जा सकता है। जिसके अनुसार. मत्स्यावतार – यह​. गीता का अवतारवाद सिद्धान्त Speaking Tree. Meaning of अवतारवाद in Hindi. वह मत या सिद्धांत कि धर्म की हानि होने पर उस की फिर से स्थापना करने के लिए भगवान जन्म लेकर या शरीर धारण करके इस संसार में आते हैं। आज का मुहूर्त. muhurat. शुभ समय में शुरु किया गया कार्य अवश्य ही निर्विघ्न रूप से. अवतारवाद का प्रथम उल्‍लेख कहां से मिलता है? Ask Gk. जैसे अवतारवाद, पुष्पवृष्टि, आकाशवाणी, देव दुन्दुभियों का बजना, विशिष्ट समयावधि एवं संख्या. योग, माया, तप, शाप एवं वरदान, अद्भुत एवं चमत्कारी घटनाएँ और दिव्य एवं अलौकिक घटनाएँ हैं. जिन्होंने रामायण की कथा को इन्द्रियातीत बना दिया है।. चौथी राम यादव अवतारवाद का समाजशास्त्र और. महाभारत रामायण भगवदगीता विष्णु पुराण. Dictionary भारतवाणी Part 543. मित्र इसके लिए पहले आत्मचिंतन को समझ लीजिए और फिर अध्यात्म चिंतन को समझिए. अक्सर ऐसा ही कहा जाता है की प्रत्येक व्यक्ति का जब कर्मबंधन शेष रह जाता है तो वह अपने कर्मो के भुगतान के लिए पुन: जन्म लेता है। इस बात में लेशमात्र भी सच्चाई.

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हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में देखते है, सुनते है यह ब्राह्मण है, क्षत्रिय है, वैश्य है शुद्र है । आपको क्या लगता है? सच में ऐसा है? नहीं । सच में ऐसा… ललित कुमार अग्रवाल. अवतारवाद. February 14, 2013, 5:07 pm IST ललित कुमार अग्रवाल in अंतरात्मा की. Doctrine of Incarnation in the Mahabharata Aligarh Muslim University. एक प्रति₹ २.००. वार्षिक शुल्क₹ १००. विदेश ५० डालर वार्षिक आजीवन शुल्क र १०००. वर्ष १२३. अंक २८.१० जुलाई २०१८ आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वादशी संवत् २०७५० दयानन्दाब्द १६४ वेद व मानव सृष्टि सम्वत् १६६०८५३११६. अवतारवाद किसे कहते है. डॉ. धीरज सिंह.