• शून्यता

    शून्यवाद या शून्यता बौद्धों की महायान शाखा माध्यमिक नामक विभाग का मत या सिद्धान्त है जिसमें संसार को शून्य और उसके सब पदार्थों को सत्ताहीन माना जाता है । "मा...

  • मध्यमा प्रतिपद

    महात्मा बुद्ध ने आर्य अष्टांगिक मार्ग को मध्यमाप्रतिपद के रूप में अभिव्यक्त किया । दो अतियों का त्यागकर मध्य मार्ग पर चलने का तरीका बौद्ध धर्म ने सिखाया है। ...

  • पारमिता

    बौद्ध धर्म में परिपूर्णता या कुछ गुणों का चरमोन्नयन की स्थिति को पारमिता या पारमी कहा गया है। बौद्ध धर्म में इन गुणों का विकास पवित्रता की प्राप्ति, कर्म को ...

  • उपाय

    बौद्ध धर्म यह मानता है कि बुद्ध ने संसार के अनेकानेक मनुष्यों को अपने-अपने उपाय-कौशल्य के आधापर उनके स्वभाव तथा समझ के अनुसार बुद्धत्व प्राप्ति का उपदेश दिया...

बौद्ध दर्शन

कम्मत्थान

प्रतिबद्ध बौद्ध दर्शन के बारे में पाली शब्द है । इसका शाब्दिक अर्थ है, कर्म की जगह. इस शब्द का मूल अर्थ किसी भी व्यक्ति के व्यवसाय में. वर्तमान समय में इस शब्द का संबंध बौद्ध ध्यान से है.
एक पालि शास्त्र में 40 टिप्पणियाँ सूची में है, जो उपकरण - इस तरह के रूप में रंग या प्रकाश से बचाने वाली क्रीम के रूप में मदों के शव, स्मरण, जैसे बुद्ध और कुछ कर सकते हैं, इस तरह के रूप में मित्रता शामिल किगए हैं ।

अद्वय

अद्वय का अर्थ है - द्वित्व भाव से रहित । महायान बौद्ध दर्शन में भाव और अभाव की दृष्टि से परे ज्ञान को अद्वय कहते हैं। इसमें अभेद का स्थान नहीं होता। इसके विप...

अनुशय

बौद्ध परिभाषा के अनुसार संसार का मूल अनुशय है। ये छह अनुशय हैं- 1 रागतृष्णा, 2 प्रतिघद्वेष, 3 मान, 4 अविद्या विद्या का विरोधी तत्व, 5 दृष्टिविशेष प्रकार की म...

अपोहवाद

बौद्ध दर्शन में सामान्य का खंडन करके नामजात्याद्यसंयुत अर्थ को ही शब्दार्थ माना गया है। न्यायमीमांसा दर्शनों में कहा गया है कि भाषा सामान्य या जाती के बिना न...

अभिधम्म साहित्य

बुद्ध के निर्वाण के बाद उनके शिष्यों ने उनके उपदिष्ट धर्म और विनय का संग्रह कर लिया। अट्टकथा की एक परम्परा से पता चलता है कि धर्म से दीघनिकाय आदि चार निकायग्...

अर्थक्रिया

अर्थक्रिया वह क्रिया है जिसके द्वारा किसी प्रयोजन की सिद्धि हो। माधवाचार्य ने सर्वदर्शनसंग्रह में बौद्धदर्शन के प्रसंग में अर्थक्रिया के सिद्धांत का विस्तृत ...

असंग

बौद्ध आचार्य असंग, योगाचार परंपरा के आदिप्रवर्तक माने जाते हैं। महायान सूत्रालंकार जैसा प्रौढ़ ग्रंथ लिखकर इन्होंने महायान संप्रदाय की नींव डाली और यह पुराने...

आर्य आष्टांगिक मार्ग

अष्टांग मार्ग महात्मा बुद्ध की प्रमुख शिक्षाओं में से एक है जो दुखों से मुक्ति पाने एवं आत्म-ज्ञान के साधन के रूप में बताया गया है। अष्टांग मार्ग के सभी मार्...

आलंबन

बौद्ध दर्शन के अनुसार आलंबन छह होते हैं - रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श और धर्म। इन छह के ही आधापर हमारे चित्त की सारी प्रवृत्तियां उठती हैं और उन्हीं के सहारे ...

उपाय

बौद्ध धर्म यह मानता है कि बुद्ध ने संसार के अनेकानेक मनुष्यों को अपने-अपने उपाय-कौशल्य के आधापर उनके स्वभाव तथा समझ के अनुसार बुद्धत्व प्राप्ति का उपदेश दिया...

क्षणिकवाद

बौद्ध दर्शन में सब से महत्वपूर्ण दर्शन क्षणिकवाद का है। इसके अनुसार, इस ब्रह्मांड में सब कुछ क्षणिक और नश्वर है। कुछ भी स्थायी नहीं। सब कुछ परिवर्तनशील है। य...

चंद्रकीर्ति

चंद्रकीर्ति - बौद्ध माध्यमिक सिद्धांत के व्याख्याता एक अचार्य। तिब्बती इतिहासलेखक तारानाथ के कथनानुसार चंद्रकीर्ति का जन्म दक्षिण भारत के किसी समंत नामक स्था...

धर्मधातु

महायान बौद्ध सम्प्रदाय में धर्मधातु का अर्थ सत्य का राज्य है। महायान दर्शन में इसके समानार्थक अन्य शब्द भी हैं जैसे- तथाता, शून्यता, प्रतीत्यसमुत्पाद आदि।

नैरात्म्यवाद

कर्मवाद तथा पुनर्जन्म में विश्वास करते हुए भी बुद्ध आत्मा की सत्ता और अमरता में विश्वास नहीं करते थे। उनके अनुसार मनुष्य के शरीर में ऐसा कोई तत्त्व नहीं है ज...

पंचशील (बौद्ध आचार)

पंचशील बौद्ध धर्म की मूल आचार संहिता है जिसको थेरवाद बौद्ध उपासक एवं उपासिकाओं के लिये पालन करना आवश्यक माना गया है। भगवान बुद्ध द्वारा अपने अनुयायिओं को दिय...

पारमिता

बौद्ध धर्म में परिपूर्णता या कुछ गुणों का चरमोन्नयन की स्थिति को पारमिता या पारमी कहा गया है। बौद्ध धर्म में इन गुणों का विकास पवित्रता की प्राप्ति, कर्म को ...

बाह्य प्रत्यक्षवाद

बाह्य प्रत्यक्षवाद ज्ञानमीमांसा का एक सिद्धान्त है जिसके अनुसार बाह्य वस्तु का ज्ञान अनुमान से नहीं वरन् प्रत्यक्ष प्राप्त होता है। प्रत्यक्ष ज्ञान संभव माने...

बाह्यानुमेयवाद

बाह्यानुमेयवाद ज्ञानमीमांसा का एक सिद्धांत है। इसके अनुसार संसार का, बाह्य वस्तुओं का, ज्ञान वस्तुजनित मानसिक आकारों के अनुमान द्वारा प्राप्त होता है। हमें न...

भावविवेक

भावविवेक या भाव्य, बौद्ध धर्म के माध्यमक शाखा के स्वतंत्रिक परम्परा के संस्थापक दार्शनिक थे। एम्स, का विचार है कि भावविवेक उन प्रथम तर्कशास्त्रियों में से है...

मध्यमा प्रतिपद

महात्मा बुद्ध ने आर्य अष्टांगिक मार्ग को मध्यमाप्रतिपद के रूप में अभिव्यक्त किया । दो अतियों का त्यागकर मध्य मार्ग पर चलने का तरीका बौद्ध धर्म ने सिखाया है। ...

महामुद्रा

महामुद्रा को प्रातः स्नान के बाद खाली पेट करना चाहिए। प्रारंभ में दोनों पैरों से इसे 3-3 बार करना चाहिए फिर लोग अपनी क्षमता के अनुसार प्राणायाम की संख्या को ...

मूलसर्वास्तिवाद

मूलसर्वास्तिवाद भारत का एक प्राचीन आरम्भिक बौद्ध दर्शन है। इस दर्शन की उत्पत्ति के बारे में तथा इसका सर्वास्तिवादी सम्प्रदाय से सम्बन्ध के बारे में प्रायः कु...

योगाचार

योगाचार बौद्ध दर्शन एवं मनोविज्ञान का एक प्रमुख शाखा है। यह भारतीय महायान की उपशाखा है जो चौथी शताब्दी में अस्तित्व में आई। योगाचार्य इस बात की व्याख्या करता...

शून्यता

शून्यवाद या शून्यता बौद्धों की महायान शाखा माध्यमिक नामक विभाग का मत या सिद्धान्त है जिसमें संसार को शून्य और उसके सब पदार्थों को सत्ताहीन माना जाता है । "मा...

सर्वास्तिवाद

सर्वास्तिवाद, बौद्ध दर्शन का एक सम्प्रदाय था जिनका मत था कि तीनों कालों में संसार की सभी वस्तुओं का अस्तित्व है। सर्वास्तिवाद को वैभाषिक भी कहते हैं। तृतीय स...

हेतुचक्र

हेतुचक्र एक दार्शनिक संस्कृत ग्रन्थ है जिसके रचयिता दिग्नाग हैं। इसमें त्रैरूप्य का वर्णन है। अनाकर Anacker 2005: p. 34, ने वासुबन्धु के वाद-विधि Method for ...