भगवान कृष्ण यादव थे या राजपूत ?

सबसे पहले ये जानते हैं कि यादव होता कौन है ? पुराणों के अनुसार सोमवंशी राजा ययाति के बड़े पुत्र महाराज यदु के वंशजो को यादव कहा जाता है। यादवों अपना जीवन यापन किसी भी तरह से कर रहे हो किन्तु वे अपना मूल कार्य गोपालन नहीं छोड़ते। जैसा कि संसार को सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में महाराज यदु को गोप रूप में वर्णित किया गया है।

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Lord Krishna was Yadav or Rajput in Hindi | भगवान कृष्ण यादव थे कि राजपूत ?

Lord Krishna was Yadav or Rajput in Hindi? भगवान कृष्ण यादव थे या राजपूत ?

सबसे पहले ये जानते हैं कि यादव होता कौन है ? पुराणों के अनुसार सोमवंशी राजा ययाति के बड़े पुत्र महाराज यदु के वंशजो को यादव कहा जाता है। यादवों अपना जीवन यापन किसी भी तरह से कर रहे हो किन्तु वे अपना मूल कार्य गोपालन नहीं छोड़ते। जैसा कि संसार को सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में महाराज यदु को गोप रूप में वर्णित किया गया है।

जबकि सम्पूर्ण यदुवंश की पृष्ठ-भूमि गोपालन वृत्ति से सम्बद्ध हैं ।

इसके लिए ऋग्वेद की यह प्राचीनत्तम ऋचा प्रमाण भूत है कि यदु को ऋग्वेद में गोप रूप वर्णन किया है ।

उत् दासा परिविषे स्मद्दिष्टी
गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च च मामहे ।।
(ऋग्वेद-१० /६२ /१० )

इसीलिए प्रत्येक यादव गोप होता है | गौरतलब हो कि जो राजपूत अपने आपको यदुवंशी बताते हैं उनका गोपालन से कोई संबंध नहीं है। फिर भगवान कृष्ण राजपूत कैसे हो सकते हैं? सम्राट सहस्त्रबाहु अर्जुन के लिए भी मत्स्य पुराण में गोपालन करने की घटनाए वर्णित हैं। विदित हो कि हरिवंश पुराण में वासुदेव जी को भी गोप ( अहीर ) कहा गया है। नन्द को तो अहीर कहा ही गया है परन्तु वासुदेव जी को भी।

गोपाभीरयादवा एकैव वंशजातीनाम् त्रतये।

विशेषणा: वृत्तिभिश्च प्रवृत्तिभिर्वंशानां प्रकारा:सन्ति।

उपरोक्त श्लोक में गोप, आभीर ( अहीर ) और यादवों को एक ही वंश का सजातीय बताया गया है? जिनमें गोप और अभीर प्रवित्ति मूलक और यादव वंश मूलक विशेषण है।

और इसी अहीर / यादव / गोप कुल में भगवान कृष्ण का जन्म हुआ़ था । भगवान कृष्ण विशुद्ध यादव थे। भगवान कृष्ण के पिता वासुदेव जी और और नन्द बाबा चचेरे भाई थे । भगवान कृष्ण को क्षत्रिय और वर्तमान यादवों को स्मृति ग्रंथो के आधार पर ईर्ष्या वश शूद्र बताने वाले देखे स्मृति ग्रन्थों के आधार पर तो भगवान कृष्ण को भी शूद्र कहा गया है। जो कि यादवों से ईर्ष्या मात्र का ही स्वरूप है यही ईर्ष्या अन्य लोगों की यादवों से आज भी विद्यमान है

यादव वर्ण व्यवस्था का पालन नहीं करते हैं। अतः लोग अपने अपने मत के अनुसार कभी क्षत्रिय, कभी वैश्य तो कभी शूद्र बोल देते हैं । परन्तु इन बातों का कोई वास्तविक स्वरूप नहीं है। यादव के पूर्वज ईसा से पूर्व भागवत धर्म का पालन करते थे जिसमें वर्ण व्यवस्था नहीं थी। गुप्त राजाओं ( गोप / अहीर) ने अपने आपको परम भगवतेय कहा है। यादवों का पारंपारक कार्य गोपालन ही है। शास्त्र सम्मत बात यह है कि गावो जगतस्य मातरम् अर्थात गाय जगत की माता होती है और माता की सेवा करना नीच कार्य केसे हो सकता है ? यादवों को शूद्र कहने का मूल कारण ही यहीं है कि यादव वर्ण व्यवस्था को कभी स्वीकार ही नहीं किए । बाद में भागवत धर्म के दर्शनों को संग्रहीत करके तथा उनमें कुछ अपने अनुसार प्रक्षिप्त करके 5 वीं शताब्दी में भागवत गीता लिखी गया।

उदाहरण :जैसे वर्ण व्यवस्था / यदि भागवत धर्म मे वर्ण व्यवस्था होती तो भागवत धर्म नष्ट ना हुआ होता , भागवत धर्म के बारे सबसे ज्यादा बुरा भला बौद्ध ग्रंथों में लिखा गया ।

गोपायनं य: कुरुते जगत: सर्वलौककम् ।
स कथं गां गतो देशे विष्णु: गोपत्वम् आगत ।।९। (हरिवंश पुराण ख्वाजा कुतुब वेद नगर बरेली संस्करण अनुवादक पं० श्री राम शर्मा आचार्य)
अर्थात् :- जो प्रभु विष्णु पृथ्वी के समस्त जीवों की रक्षा करने में समर्थ है ।
वही गोप (आभीर) के घर (अयन)में गोप बनकर आता है ।९। हरिवंश पुराण १९ वाँ अध्याय ।

तथा और भी देखें—यदु को गायों से सम्बद्ध होने के कारण ही यदुवंशी (यादवों) को गोप कहा गया है ।देखें— महाभारत का खिल-भाग हरिवंश पुराण__________________________________________” इति अम्बुपतिना प्रोक्तो वरुणेन अहमच्युत ।गावां कारणत्वज्ञ: सतेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वं एष्यति ।।२२।।द्या च सा सुरभिर्नाम् अदितिश्च सुरारिण: ते$प्यमे तस्य भुवि संस्यते ।।२४।।वसुदेव: इति ख्यातो गोषुतिष्ठति भूतले ।गुरु गोवर्धनो नामो मधुपुर: यास्त्व दूरत:।।२५।।सतस्य कश्यपस्य अंशस्तेजसा कश्यपोपम:।तत्रासौ गोषु निरत: कंसस्य कर दायक: तस्य भार्या द्वयं जातमदिति: सुरभिश्चते ।।२६।।देवकी रोहिणी चैव वसुदेवस्य धीमत:_________________________________________अर्थात् हे विष्णु ! महात्मा वरुण के एैसे वचन सुनकरतथा कश्यप के विषय में सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करकेउनके गो-अपहरण के अपराध के प्रभाव सेकश्यप को व्रज में गोप (आभीर) का जन्म धारण करने का शाप दे दिया ।।२६।।कश्यप की सुरभि और अदिति नाम की पत्नीयाँ क्रमश:रोहिणी और देवकी हुईं ।गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्री रामनायण दत्त शास्त्री पाण्डेय ‘ राम’ द्वारा अनुवादित हरिवंश पुराण में वसुदेव को गोप ही बताया है ।इसमें यह 55 वाँ अध्याय है । पितामह वाक्य नाम- से पृष्ठ संख्या [ 274 ]_________________________________________षड्यन्त्र पूर्वक पुराणों में कृष्ण को गोपों से पृथक दर्शाने के लिए कुछ प्रक्षिप्त श्लोक समायोजित किये गये हैं । जैसे भागवतपुराण दशम् स्कन्ध के आठवें अध्याय मेंयदूनामहमाचार्य: ख्यातश्च भुवि सर्वत: ।सुतं मया मन्यते देवकी सुतम् ।।७।अर्थात् गर्गाचार्य जी कहते हैं कि नन्द जी मैं सब जगह यादवों के आचार्य रूप में प्रसिद्ध हूँ ।यदि मैं तुम्हारे पुत्र का संस्कार करुँगा । तो लोग समझेगे यह तो वसुदेव का पुत्र है ।७।एक श्लोक और” अयं हि रोहिणी पुत्रो रमयन् सुहृदो गुणै: ।आख्यास्यते राम इति बलाधिक्याद् बलं विदु:।यदूनाम् अपृथग्भावात् संकर्षणम् उशन्ति उत ।।१२अर्थात् गर्गाचार्य जी ने कहा :-यह रोहिणी का पुत्र है ।इस लिए इसका नाम रौहिणेय ।यह अपने लगे सम्बन्धियों और मित्रों को अपने गुणों से आनन्दित करेगा इस लिए इसका नाम राम होगा।इसके बल की कोई सीमा नहीं अत: इसका एक नाम बल भी है ।यह यादवों और गोपों में कोई भेद भाव नहीं करेगा इस लिए इसका नाम संकर्षणम् भी है ।१२।परन्तु भागवतपुराण में ही परस्पर विरोधाभास है ।देखें—” गोपान् गोकुलरक्षां निरूप्य मथुरां गत ।नन्द: कंसस्य वार्षिक्यं करं दातुं कुरुद्वह।।१९।वसुदेव उपश्रुत्य भ्रातरं नन्दमागतम्।ज्ञात्वा दत्तकरं राज्ञे ययौ तदवमोचनम् ।२०।अर्थात् कुछ समय के लिए गोकुल की रक्षा का भाव नन्द जी दूसरे गोपों को सौंपकर कंस का वार्षिक कर चुकाने के लिए मथुरा चले गये ।१९। जब वसुदेव को यह मालुम हुआ कि मेरे भाई नन्द मथुरा में आये हैं ।जानकर कि भाई कंस का कर दे चुके हैं ; तब वे नन्द ठहरे हुए थे बहाँ गये ।२०।और ऊपर हम बता चुके हैं कि वसुदेव स्वयं गोप थे ,तथा कृष्ण का जन्म गोप के घर में हुआ।फिर यह कहना पागलपन है कि कृष्ण यादव थे नन्द गोप थे । भागवतपुराण बारहवीं सदी की रचना है ।
Lord Krishna was Yadav or Rajput in Hindi | भगवान कृष्ण यादव थे कि राजपूत ?