Scions of Krishna: A Brief History of Jadon, Bhati and Saini Rajputs

श्रेष्ठ वंश में श्रेष्ठ सन्तानें का ही प्रादुर्भाव होता है ।

दोगले और गाँलि- गलोज करने वाले और अय्याश लोग नि: सन्देह अवैध यौनाचारों से उत्पन्न होते हैं ।

जिनके पास कुतर्क ,गाली और भौंकने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता !

जिनमें न क्षमा होती है और न क्षमता ही ।
धैर्य हीन बन्दर के समान चंचल व लंगोटी से कच्चे होते हैं
मिथ्या अहं और मुर्दों जैसी अकड़ ही होती है ।
ज्ञान के नाम पर रूढ़िवादी पुरोहितों से सुनी सुनायीं किंवदन्तियाँ ही प्रमाण होती हैं ।

अहीरों को द्वेष वश गालियाँ देने वाले कुछ लोग जो स्वयं को राजपूत अथवा क्षत्रिय कहते हैं ।

जबकि भारतीय शास्त्रों में जैसे पाराशर संहिता , ब्रह्मवैवर्त पुराण तथा स्कन्द पुराण सह्याद्रि खण्ड में

राजपूतों को वर्ण संकर और शूद्रधर्मी कहा गया है ।

चारण और भाट बंजारे समुदाय के लोग जो स्वयं को राजपूत कहते हैं ।

और माली जन-जाति के लोग भी स्वयं को राजपूत कहते हैं। इसका प्रबल प्रमाण हैं ।

राजपूत संघ है जिसमें बहुतायत पिछल जातियों का समावेश है ।

जादौन - ये बंजारा समुदाय है हो भारत में आने से पहले अफगानिस्तान में जादून/ गादूँन पठान थे ।

ये पठान यहूदीयों से सम्बंधित स्ववयं को बनी इजरायल ही कहते थे ।
भारत में बीकानेर और जैसलमैर में जादौन बंजारे हैं ।

परन्तु राजस्थान के ग्वालियर गजेटियर के अनुसार ब्रह्म पाल अहीर के वंशज हैं ।

सैैैै जो माली समाज से हैैं ।

ये ख़ुद को मालिया राजपूत कहते है . सैन्य में काम करने कारण ये सैनिक से सैनी उपनाम लगाने लगे .
और अब ये राजपूत सैनी को शूरसेन से जोड़ रहे है।
जबकि समस्त यदुवंशज स्वयं को गोप अथवा यादव ही मानते थे ।
कल को कोई वसुदेव सैनी भी लिखा सकता है ।
सूरसैनी नाम ये प्राचीनत्तम ग्रन्थों में किसी यदुवंशी का विवरण नहीं है ।

इस प्रकार के लोगों के विषय में कुछ ऐैतिहासिक तथ्य:-

अभी तक जादौन , राठौर और भाटी आदि राजपूत
पुष्य-मित्र सुंग कालीन काल्पनिक स्मृतियों और पुराणों तथा महाभारत आदि के हबाले से अहीरों को शूद्र तथा म्लेच्‍छ और दस्यु के रूप में दिखाते हैं

परन्तु समाज शास्त्री

(" Shashishekhar Gopal Deogaonkar) जी द्वारा रचित (tha banzara) पुस्तक के पेज 19 में

जादौन , चौहान भाटी कहीं चारण तो कहीं राजपूत हैं ।

इनको चाहिए कि पहले मुगल स्त्रियों से विवाह के कारण फैली संकरता पर विचार करें और ब्रह्मवैवर्त पुराण, स्कंद पुराण सह्याद्रि खण्ड,शब्दकल्पद्रुम और मुहम्मद कासिम आदि इतिहासकारों द्वारा बताई गयी स्वयं की उत्पत्ति पर तनिक विचार करें!!

राजपूत थे भी नही तो पृथ्वीराज का राजपूत होने का तो सवाल ही नही पैदा होता क्योकि राजपूत शब्द का पुराने ग्रथो में कही भी कोई उल्लेख नही है , ये शब्द ग्याहरवीं शताब्दी के बाद दिखाइ देता है।

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जिसे पुराणों तथा स्मृति कारों''ने इस प्रकार से वर्ण संकर (Hybrid) रूप में वर्णित किया है ।

ब्रह्मवैवर्तपुराणम् में भी राजपूत की उत्पत्ति का वर्णन

क्षत्रिय से करणी जाति की कन्या में उत्पन्न संतान राजपूत है ।

इसी करण कन्या को चारणों ने करणी माता के रूप में अपनी कुल देवी स्वीकार कर लिया है

जिसके बैनर तले राजपूत एकजुट हो रहे हैं

जिसका विवरण हम आगे देंगे -

ज्वाला प्रसाद मिश्र ( मुरादावादी) 'ने अपने ग्रन्थ जातिभास्कर में पृष्ठ संख्या 197 पर राजपूतों की उत्पत्ति का हबाला देते हुए उद्धृत किया कि ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ब्रह्मवैवर्तपुराणम्‎ (खण्डः १ -(ब्रह्मखण्डः)

← अध्यायः१० ब्रह्मवैवर्तपुराणम्

श्लोक संख्या १११

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क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रो बभूव ह ।।

राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तितः।।

1/10।।111

ब्रह्मवैवर्तपुराणम् में भी राजपूत की उत्पत्ति

क्षत्रिय से करण (चारण) कन्या में राजपूत उत्पन्न हुआ और राजपुतानी में करण पुरुष से आगरी उत्पन्न हुआ ।

तथा स्कन्द पुराण सह्याद्रि खण्ड अध्याय 26 में राजपूत की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए कहा

" कि क्षत्रिय से शूद्र जाति की स्त्री में राजपूत उत्पन्न होता है यह भयानक, निर्दय , शस्त्रविद्या और रण में चतुर तथा शूद्र धर्म वाला होता है ;और शस्त्र वृत्ति से ही अपनी जीविका चलाता है ।

( स्कन्द पुराण सह्याद्रि खण्ड अध्याय 26)

और ब्रह्मवैवर्तपुराणम् में भी राजपूत की उत्पत्ति

क्षत्रिय से करण (चारण) कन्या में राजपूत उत्पन्न हुआ और राजपुतानी में करण पुरुष से आगरी उत्पन्न हुआ ।

आगरी संज्ञा पुं० [हिं० आगा] नमक बनानेवाला पुरुष ।

लोनिया ये भी बंजारे हैं ।

प्राचीन क्षत्रिय पर्याय वाची शब्दों में राजपूत ( राजपुत्र) शब्द नहीं है ।

विशेष:- उपर्युक्त राजपूत की उत्पत्ति से सम्बन्धित पौराणिक उद्धरणों में करणी (चारण) और शूद्रा

दो कन्याओं में क्षत्रिय के द्वारा राजपूत उत्पन्न होने में सत्यता नहीं क्योंकि दो स्त्रियों में एक पुरुष से सन्तान कब से उत्पन्न होने लगीं ।

परन्तु इतना अवश्य है कि ये राजपूत संघ में चारण भाट और अन्य बंजारा जाति के लोग समाहित हैं ।

जो स्वयं को रा

और रही बात राजपूतों की तो राजपूत एक संघ है

जिसमें अनेक जन-जातियों का समायोजन है ।

चारण, भाट , लोधी( लोहितिन्) कुशवाह ( कृषिवाह) बघेले आदि और कुछ गुर्जर जाट और अहीरों से भी राजपूतों का उदय हुआ ।

" ब्रह्म वैवर्तपुराण में राजपूतों की उत्पत्ति क्षत्रिय के द्वारा करण कन्या से बताई "

करणी मिश्रित या वर्ण- संकर जाति की स्त्री होती है

ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार करण जन-जाति वैश्य पुरुष और शूद्रा-कन्या से उत्पन्न है।

और करण लिखने का काम करते थे ।

ये करण ही चारण के रूप में राजवंशावली लिखते थे ।

ऐसा समाज-शास्त्रीयों ने वर्णन किया है ।

तिरहुत में अब भी करण पाए जाते हैं ।

लेखन कार्य के लिए कायस्थों का एक अवान्तर भेद भी करण कहलाता है ।

करण नाम की एक आसाम, बरमा और स्याम की जंगली जन-जाति है ।

क्षत्रिय पुरुष से करण कन्या में जो पुत्र पैदा होता उसे राजपूत कहते हैं।

वैश्य पुरुष और शूद्रा कन्या से उत्पन्न हुए को करण कहते हैं ।

और ऐसी करण कन्या से क्षत्रिय के सम्बन्ध से राजपुत्र (राजपूत) पैदा हुआ।

वैसे भी राजा का वैध पुत्र राजकुमार कहलाता था राजपुत्र नहीं ।

चारण जो कालान्तरण में राजपूतों के रूप में ख्याति-लब्ध हुए और अब इसी राजपूती परम्पराओं के उत्तराधिकारी हैं ।

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स्कन्द पुराण के सह्याद्रि खण्ड मे अध्याय २६ में

वर्णित है ।

शूद्रायां क्षत्रियादुग्र: क्रूरकर्मा: प्रजायते।

शस्त्रविद्यासु कुशल: संग्राम कुशलो भवेत्।१

तया वृत्या: सजीवेद् य: शूद्र धर्मा प्रजायते ।

राजपूत इति ख्यातो युद्ध कर्म्म विशारद :।।२।

कि राजपूत क्षत्रिय द्वारा शूद्र कन्याओं में उत्पन्न सन्तान है

जो क्रूरकर्मा शस्त्र वृत्ति से सम्बद्ध युद्ध में कुशल होते हैं ।

ये युद्ध कर्म के जानकार और शूद्र धर्म वाले होते हैं ।

ज्वाला प्रसाद मिश्र' मुरादावादी'ने जातिभास्कर ग्रन्थ में पृष्ठ संख्या १९७ पर राजपूतों की उत्पत्ति का ऐसा ही वर्णन किया है ।

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स्मृति ग्रन्थों में राजपूतों की उत्पत्ति का वर्णन है

राजपुत्र ( राजपूत)वर्णसङ्करभेदे (रजपुत) “वैश्यादम्बष्ठकन्यायां राजपुत्रस्य सम्भवः”

इति( पराशरःस्मृति )

वैश्य पुरुष के द्वारा अम्बष्ठ कन्या में राजपूत उत्पन्न होता है।

इसी लिए राजपूत शब्द ब्राह्मणों की दृष्टि में क्षत्रिय शब्द की अपेक्षा हेय है ।

राजपूत बारहवीं सदी के पश्चात कृत्रिम रूप से निर्मित हुआ ।

जिसमें चारण भाट और अन्य पिछड़ी जातियों के लोग अधिक थे । पर चारणों का वृषलत्व कम है ।

इनका व्यवसाय राजाओं ओर ब्राह्मणों का गुण वर्णन करना तथा गाना बजाना है ।

चारण लोग अपनी उत्पत्ति के संबंध में अनेक अलौकिक कथाएँ कहते हैं; ।

कालान्तरण में एक कन्या को देवी रूप में स्वीकार कर उसे करणी माता नाम दे दिया करण या चारण का अर्थ मूलत: भ्रमणकारी होता है ।

चारण जो कालान्तरण में राजपूतों के रूप में ख्याति-लब्ध हुए और अब इसी राजपूती परम्पराओं के उत्तराधिकारी हैं ।

करणी चारणों की कुल देवी है ।

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सोलहवीं सदी के, फ़ारसी भाषा में "तारीख़-ए-फ़िरिश्ता नाम से भारत का इतिहास लिखने वाले इतिहासकार, मोहम्मद क़ासिम फ़िरिश्ता ने राजपूतों की उत्पत्ति के बारे में लिखा है ।

कि जब राजा, अपनी विवाहित पत्नियों से संतुष्ट नहीं होते थे, तो अक्सर वे अपनी महिला दासियो द्वारा बच्चे पैदा करते थे, जो सिंहासन के लिए वैध रूप से जायज़ उत्तराधिकारी तो नहीं होते थे, लेकिन राजपूत या राजाओं के पुत्र कहलाते थे। 7-8

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सन्दर्भ देखें:- मोहम्मद क़ासिम फ़िरिश्ता की इतिहास सूची का ...

[7] "History of the rise of the Mahomedan power in India, till the year A.D. 1612: to which is added an account of the conquest, by the kings of Hydrabad, of those parts of the Madras provinces denominated the Ceded districts and northern Circars : with copious notes, Volume 1". Spottiswoode, 1829. पृ॰ xiv. अभिगमन तिथि 29 Sep 2009

[8] Mahomed Kasim Ferishta (2013). History of the Rise of the Mahomedan Power in India, Till the Year AD 1612. Briggs, John द्वारा अनूदित. Cambridge University Press. पपृ॰ 64–. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-108-05554-3.

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विशेष:- उपर्युक्त राजपूत की उत्पत्ति से सम्बन्धित पौराणिक उद्धरणों में करणी (चारण) और शूद्रा

दो कन्याओं में क्षत्रिय के द्वारा राजपूत उत्पन्न होने में सत्यता नहीं है क्योंकि दो स्त्रियों में एक पुरुष से सन्तान कब से उत्पन्न होने लगीं

' परन्तु कुछ सत्य अवश्य है कि राजपूतों के अन्तर्गत कुछ वर्ण संकर जातियों या भी समावेश हुआ ।

परन्तु राजपूत सत्यनिष्ठा पर दिनचर्या वितीत करने वाले

आन पर कुर्बान होने वाले और दु:खियों के रक्षक होते थे और आज हैं भी वे ही प्राचीन राजाओं के वंशज हैं !

कालान्तरण में राजपूत एक संघ बन गया

जिसमें कुछ अनेक चारण' भाट तथा विदेशी जातियों शक सीथियन का समावेश हो गया।

और रही बात आधुनिक समय में राजपूतों की तो ;

राजपूत एक संघ है ।

जिसमें अनेक जन-जातियों का समायोजन है ।

जैसे

चारण, भाट , लोधी( लोहितिन्) कुशवाह ( कृषिवाह) बघेले आदि और कुछ गुर्जर जाट और अहीरों से भी राजपूतों का उदय हुआ ।

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' परन्तु बहुतायत से चारण और भाट या भाटी बंजारों का समूह ही राजपूतों में समायोजन हुआ है ।

ये चारण और भाट ब्रजभाषा की पिंगल और डिंगल शैली में गायन और कविताओं की रचना करते थे ।

करणी माता एक चारण कन्या थीं ।

आज राजपूतों कि गठन करणी सेना के बैनर तले हो रहा है

मुगल काल से राजपूत शब्द प्रकाश में आया

कुछ प्रसिद्ध इतिहास भी कहते हैं ।

तो इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं क्यों कि पुराणों या स्मृतियों ने जिन वेदों को आपना उपजीव्य माना है
उनमें भी यदु और तुर्वशु को दास, दस्यु और असुर तक कहकर वर्णित किया है।

जैसे- ऋग्वेद में --जो भारतीय संस्कृति में ही नहीं अपितु विश्व- संस्कृतियों में प्राचीनत्तम ग्रन्थ है ।
और जिसके सूक्त ई०पू० २५०० से १५००के काल तक का दिग्दर्शन करते हैं --
इसी ऋग्वेद में बहुतायत से यदु और तुर्वसु का साथ साथ वर्णन हुआ है ।

वह भी दास अथवा असुर और गोप रूपों में
दास शब्द का वैदिक ऋचाओं में अर्थ देव संस्कृति के के प्रतिद्वन्द्वी असुरों से ही है ।

परन्तु ये दास अपने पराक्रम बुद्धि कौशल से सम्माननीय ही रहे हैं ।

ईरानीयों की भाषाओं में दास (दाहे) रूप में नेता या दाता का वाचक है।
और बाद में दास का अर्थ गुलाम भी हुआ।
परन्तु ऋग्वेद के दशम् मण्डल के ६२वें सूक्त की १० वीं ऋचा में यदु और तुर्वसु को स्पष्टत: दास के रूप में सम्बोधित किया गया है।

वह भी गोपों को रूप में
" उत् दासा परिविषे स्मद्दिष्टी ।
" गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च च मामहे ।।
(ऋग्वेद १०/६२/१०)
यदु और तुर्वसु नामक दौनो दास जो गायों से घिरे हुए हैं
हम उन सौभाग्य शाली दौनों दासों की प्रशंसा करते हैं ।
यहाँ पर गोप शब्द स्पष्टत: है।
गो-पालक ही गोप होते हैं
अन्यत्र ऋग्वेद में प्राय: ऋचाओं में यदु और तुर्वसु का वर्णन नकारात्मक रूप में हुआ है ।

प्रियास इत् ते मघवन् अभीष्टौ
नरो मदेम शरणे सखाय:।
नि तुर्वशं नि यादवं शिशीहि
अतिथिग्वाय शंस्यं करिष्यन् ।।
(ऋग्वेद 7/19/8 ) में भी यही ऋचा
अथर्ववेद में भी (काण्ड 20 /अध्याय 5/ सूक्त 37/ ऋचा 7)
हे इन्द्र ! हम तुम्हारे मित्र रूप यजमान
अपने घर में प्रसन्नता से रहें; तथा
तुम अतिथिगु को सुख प्रदान करो ।
और तुम तुर्वसु और यादवों को क्षीण करने वाले बनो। अर्थात् उन्हें परास्त करने वाले बनो !
(ऋग्वेद ७/१९/८)
ऋग्वेद में भी यथावत यही ऋचा है ; इसका अर्थ भी देखें :- हे ! इन्द्र तुम अतिथि की सेवा करने वाले सुदास को सुखी करो ।

और तुर्वसु और यदु को हमारे अधीन करो।
और भी देखें यदु और तुर्वसु के प्रति पुरोहितों की दुर्भावना अर्वाचीन नहीं अपितु प्राचीनत्तम भी है ।...
देखें---
अया वीति परिस्रव यस्त इन्दो मदेष्वा ।
अवाहन् नवतीर्नव ।१।
पुर: सद्य इत्थाधिये दिवोदासाय ,
शम्बरं अध त्यं तुर्वशुं यदुम् ।२।
(ऋग्वेद ७/९/६१/ की ऋचा १-२)
हे सोम ! तुम्हारे किस रस ने दासों के निन्यानवे पुरों अर्थात् नगरों) को तोड़ा था ।
उसी रस से युक्त होकर तुम इन्द्र के पीने के लिए प्रवाहित हो ओ। १।
शम्बर के नगरों को तोड़ने वाले ! सोम रस ने ही तुर्वसु की सन्तान तुर्को तथा यदु की सन्तान यादवों (यहूदीयों ) को शासन (वश) में किया।
यदु को ही ईरानी पुरातन कथाओं में यहुदह् कहा
जो ईरानी तथा बैबीलॉनियन संस्कृतियों से सम्बद्ध साम के वंशज- असीरियन जन-जाति के सहवर्ती यहूदी थे।
असुर तथा यहूदी दौनो साम के वंशज- हैं
भारतीय पुराणों में साम के स्थान पर सोम हो गया ।
यादवों से घृणा चिर-प्रचीन है देखें--और भी
सत्यं तत् तुर्वशे यदौ विदानो अह्नवाय्यम् ।
व्यानट् तुर्वशे शमि । (ऋग्वेद ८/४६/२
हे इन्द्र! तुमने यादवों के प्रचण्ड कर्मों को सत्य (अस्तित्व) में मान कर संग्राम में अह्नवाय्यम् को प्राप्त कर डाला ।
अर्थात् उनका हनन कर डाला ।
अह्नवाय्य :- ह्नु--बा० आय्य न० त० ।
निह्नवाकर्त्तरि ।
सत्यं तत्तुर्वशे यदौ विदानो अह्नवाय्यम्” ऋ० ८, ४५, २७ अथर्ववेद तथा ऋग्वेद में यही ऋचांश बहुतायत से है ।
किम् अंगत्वा मघवन् भोजं आहु: शिशीहि मा शिशयं
त्वां श्रृणोमि ।।
अथर्ववेद का० २०/७/ ८९/३/
हे इन्द्र तुम भोग करने वाले हो ।
तुम शत्रु को क्षीण करने वाले हो ।
तुम मुझे क्षीण न करो ।
यदु को दास अथवा असुर कहना सिद्ध करता है कि ये असीरियन जन-जाति से सम्बद्ध सेमेटिक यहूदी यों के पूर्वज यहुदह् ही थे ।

यद्यपि यदु और यहुदह् शब्द की व्युत्पत्तियाँ समान है ।
अर्थात् यज्ञ अथवा स्तुति से सम्बद्ध व्यक्ति ।
यहूदीयों का सम्बन्ध ईरान तथा बेबीलोन से भी रहा है ।
ईरानी असुर संस्कृति में दाहे शब्द दाहिस्तान के सेमेटिक मूल के व्यक्तियों का वाचक है।
यदु एेसे स्थान पर रहते थे।
जहाँ ऊँटो का बाहुल्य था
ऊँट उष्ण स्थान पर रहने वाला पशु है ।
यह स्था (उष + ष्ट्रन् किच्च )
ऊषरे तिष्ठति इति उष्ट्र (ऊषर अर्थात् मरुस्थल मे रहने से ऊँट संज्ञा )।
(ऊँट) प्रसिद्धे पशुभेदे स्त्रियां जातित्त्वात् ङीष् ।
हस्तिगोऽश्वोष्ट्रदमकोनक्षत्रैर्यश्च जीवति” “नाधीयीताश्वमारूढ़ो न रथं न च हस्तिनम्
देखें---ऋग्वेद में
शतमहं तिरिन्दरे सहस्रं वर्शावा ददे ।
राधांसि यादवानाम्
त्रीणि शतान्यर्वतां सहस्रा दश गोनाम् ददुष्पज्राय साम्ने ४६।
उदानट् ककुहो दिवम् उष्ट्रञ्चतुर्युजो ददत् ।
श्रवसा याद्वं जनम् ।४८।१७।
यदु वंशीयों में परशु के पुत्र तिरिन्दर से सहस्र संख्यक धन मैने प्राप्त किया !
ऋग्वेद ८/६/४६।
पुराणों में भी वेदों के आधार पर किंवदन्तियों और काल्पनिकताओं के आधार पर लिखा गया ।
चलिए
आज इन अहीरों के प्रतिद्वन्द्वीयों का भी इतिहास देख लो
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जैसे जादौन (जिसे जादोैं के रूप में भी जाना जाता है) राजपूतों के एक कबीले (गोत्र) से सम्बद्ध हैं।

जादौन मूलतः बंजारा समुदाय रहा है ।
एक खानाबदोश समुदाय, माली (माली) जाति का एक समूह और भारत में यह जादौं कुर्मी जाति की एक उपजाति को भी सन्दर्भित करता है।

पहले हम नीचे भारत के प्रसिद्ध समाजशास्त्री व
लेखक एस.जी. देवगोनकर (S.G.DeoGaonkar) और उनकी सहायिका शैलजा एस. देवगोनकर के द्वारा लिखी बंजारा जन-जाति के गहन सर्वेक्षण पर आधारित पुस्तक "
" भारत की बंजारा जाति और जनजाति - भाग 3"
से अंश उद्धृत करते हैं ।
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Sociologist Deu Gaonkar and his assistant Shelaja Gaonkar
Wrote in his book.
- which publishes books and lives on history.

"Mathurias ,Labhans and Dharias are The Charans Banjara ,
Who are more in numbers and important Among The Banjara are Divided into Five main class viz.
Rathod, Panwar, Chauhan, puri and Jadon or Burthia.
Each Class Sept is Divided into a Number of Sub-Septs Among Rathods The important Sub-sept of Bhurkiya called After The Bhika,
Rathod Which is Again sub-divided into four groups viz Merji, Mulaysi, Dheda and Khamdar( The Groups based on the four son of Bhika Rathod ) ⛑

The Mathuriya Banjara already referred to Aabove derive their name from mathura and are supposed to be bramins Whith The secred thread ceremony monj.

They are who called Ahiwasi.
The third Devision the Labhans Probably Derived Their from Labana i.e.

Salt Which they used to Carry from place to place Another etymology relate the Lava The son of Lord Rama chandra connecting lineage to him .

The Dharis( Dhadis) are The bards of the caste who get the lowest rank According to their story, their ancestor was a disple of Guru Nanak (The Sikh guru) Whith whom The Attended a feast given by mughal Emperor humanyun .

There he ete cow flesh and conseguently become a muhmmedan and and was circumcised .
He worked as a musicians at mughal court .his son joined at the Charans and became the Bards of the banjaras.
the Dharias are musicians and mendicants .
they worship sarswati and their marriage offer a he-got to Gagi and Gandha.

The two sons of original bhat who become Muhammedan.
From the used tahsil of Yeotmal District.

where both he sub-Groups of Rathods viz.
the bada Rathod and The chhota Rathod are present the following clans are reported

Bada -Rathod :
(1-khola 2-Ralot 3- Khatrot 4- Gedawat 5- Raslinaya 6- Didawat .

Chhota- Bajara (1-Meghawat 2- Gheghawat 3-Ralsot 4- Ramavat 5-Khelkhawat 6- Manlot 7-Haravat 8-Tolawat 9-Dhudhwat 10- Sangawat 11- Patolot ..

These two types are from the Charans banjara Alternativly are called " Gormati " in the area Another set of reported from the area are ..

" The Banjara caste and tribe of India -3 "
writer S.G.DeoGaonkar
Shailja S. Deogaonkar .
इसी का हिन्दी रूपान्तरण निम्न है
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भारत की बंजारा जाति और जनजाति - भाग 3"
लेखक एस .जी.देवगॉनकर (S.G.DeoGaonkar)
और शैलजा एस. देवगांवकर
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अध्याय द्वितीय पृष्ठ संख्या- 18-

--जो लोग राजपूत हैं उन्हीं के कुछ समुदाय बंजारे भी हैं

-जैसे मथुरिया ,लाभान और धारीस ये चारण (भाट) हैं
जो संख्या में अधिक हैं ;
और बंजारों के बीच बंजारे रूप में ही महत्वपूर्ण पाँच मुख्य वर्गों में विभाजित हैं।

१- राठौड़, २-पंवार, ३-चौहान, ४-पुरी और ५-जादौन या बुर्थिया।

भाटी ये भी मूलतः चारण बंजारे हैं --जो अब स्वयं को यदुवंशी या जादौनों से सम्बद्ध करते हैं ।
वस्तुत वे भाट या चारण ही हैं ।
भाट शब्द संस्कृत भरत ( नट- वंशावलि गायक) शब्द का तद्भव रूप है।
और व्रात्य का रूपान्तरण भी भाट या भट्टा हुआ ।
अंग्रेज़ी में बरड(Bard) शब्द भरत का रूपान्तरण है।
क्यों कि दौनों रूपों से भाट या भट्टा शब्द ही विकसित होता है ।

मध्यकालीन हिन्दी कोशों में जादौं का अर्थ नीच कुल में उत्पन्न / नीच जाति का ।
✍✍
प्रोफेसर मदन मोहन झा द्वारा सम्पादित हिन्दी शब्द कोश में जादौं का एक अर्थ नीचजाति या नीच कुल में उत्पन्न लिखा है ।
प्रोफेसर, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, मानित विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से सम्बद्ध हैं ।

यद्यपि जादौन शब्द राजस्थानी भाषा में जादव का रूपान्तरण है ।
कुछ जादौन राजपूत स्वयं को करौली के यदुवंशी पाल ( आभीर) राजाओं का तो वंशज मानते हैं ;
परन्तु अहीरों से पीढ़ी दर पीढ़ी घृणा करते रहते हैं ।
दर असल मुगल काल में ये लोग मुगलों से जागीरें मिलने के कारण ठाकुर उपाधि धारण करने लगे ।

करौली के जादौनों का उदय आठवीं सदी के उत्तरार्द्ध नवीं सदी के पूर्वार्द्ध में मथुरा के यादव शासक ब्रह्मपाल अहीर से हुआ जो दशवें अहीर राजा थे ।⬇

राजा धर्मपाल बाद ईस्वी सन् 879 में इच्छपाल (ऋच्छपाल) मथुरा के शासक हुए ।

इनके ही दो पुत्र थे प्रथम पुत्र ब्रहमपाल जो मथुरा के शासक थे हुए दूसरे पुत्र विनयपाल जो महुबा (मध्यप्रदेश) के शासक हुए

विजयपाल भी करौली के यादव अहीरों की जादौंन शाखा का मूल पुरुष/ आदि पुरुष/ संस्थापक विजयपाल माना गया परन्तु इतिहास में ब्रह्मपाल ही मान्य हैं

विजयपाल 999 ईस्वी सन् में शासक बने ।

विजयपाल जिसने 1040 ईस्वी में अपने राज्य की राजधानी मथुरा से हटाकर बयाना

( विजय मंदिर गढ़) को बनाया ------------

और ब्राह्मणों ने इनका राजपूती करण करके इन्हे मूँज के जनेऊ पहनायी और इन्हें तभी क्षत्रिय प्रमाण पत्र दे दिया।

तब से अधिकतर बंजारे क्षत्रिय हो गये
और ब्राह्मण धर्म का पालन करने लगे ।

ठाकुर शब्द भी तुर्को के माध्यम से ईसा की नवम शताब्दी में प्रचलित होता है ।
यह मूलत: तेक्वुर (tekvur) रूप में है।
--जो संस्कृत कोश कारों ने ठक्कुर के रूप स्वीकार कर लिया।
विदित हो कि बाद में प्रत्येक वर्ग को राठौड़ बंजारों के बीच कई उप-वर्गों में विभाजित किया गया है।
अब राठौर और राठौड़ --जो अलग अलग रूपों में दो जातियाँ बन गयी हैं ।
वे भी मूलत: एक ही थे एक राजपूत के रूप में हैं तो दूसरी बंजारे के रूप में।
आज भी हैं ।

ऐसे ही जादौनों का हाल हुआ है-।
जादौन --जो बंजारे थे वे मुगलों के प्रभाव में ठक्कुर हो गये ।
इसी प्रकार गौड और गौड़ जन-जातियों के भेद
इतना ही नहीं अहीरों की शाखा गुज्जर और राजपूतों की गुर्ज्जरः दो हैं
'वह भी इसी प्रकार हुआ एक अपने को रघुवंश से सम्बद्ध मानते रहे हैं तो दूसरे नन्द या वृषभानु गोप अथवा अहीरों से सम्बद्ध मानते रहे हैं।
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क्यों कि राधा और वेदों की अधिष्ठात्री गायत्री को अपने गुज्जर कबीले की मानने वाले अहीरों से सम्बद्ध हैं।
गुज्जर गायत्री और राधा को चैंची गोत्र की कन्या बताते हैं परन्तु पुराणों में इन्हें आभीर कन्या बताया गया

यद्यपि पाश्चात्य इतिहास कार दोनों गुज्जर और गुर्ज्जरः को जॉर्जिया (गुर्जिस्तान) से भी सम्बद्ध मानते हैं।
इसी प्रकार जाट और जट्ट दो रूप हैं ।
जट्ट गुरूमुखी होकर गुरूनानक के अनुयायी हैं
और जाट मुसलमान और हिन्दु रूप में भी हैं ।
दर -असल महाभारत के कर्ण पर्व में बल्ख अफगानिस्तान में तथा ईरान में रहने वाले जर्तिका जन -जाति-के रूप में हैं --जो पंजाब के अहीरों से सम्बद्ध हैं

वास्तव में जर्तिका शब्द पूर्व रूप में संस्कृत चारतिका का रूपान्तरण है
क्यों कि ये चरावाहों का समुदाय था ।
जिसे पाश्चात्य इतिहास विदों ने आर्य्य कहा ।
गुर्ज्जरः तो गौश्चर का परवर्ती रूपान्तरण है ही ।
अब बात करते हैं कि जादौन शब्द की व्युत्पत्ति कैसे हुई
यद्यपि ये जादौन यदुवंशी की अफगानिस्तान के जादौन पठानों से निकल् हुई शाखा है ।
जो स्वयं को वनी- इज़राएल अर्थात्‌ यहूदियों के वंशज मानते हैं ।

इस लिए ये भी यदुवंश की ही एक यायावर शाखा थी ।
कालान्तरण में इन्होंने करौली रियासत के पाल उपाधि धारक यदुवंशी शासकों को अपनाया।

पाल केवल अहीरों का गो-पालन वृत्ति मूलक विशेषण रहा है।
धेनुकर धनगर इन्हें की शाखा है ।
अन्यत्र भी पश्चिमीय एशिया के संस्कृतियों में पॉल और गेडेरी शब्द चरावाहों के लिए रूढ़ हैं ।

हिब्रू बाइबिल में पॉल ईसाई मिशनरीयों की उपाधि रही है --जो वपतिस्मा या उपनयन संस्कार करते थे ।
--जो मूलतः ये ईसाई भी यहूदियों से सम्बद्ध थे ।
भारतीय चारण या भाट बंजारों में

जादौनों के बाद के भूरिया नामक महत्वपूर्ण उप-वर्ग, राठौड़ों में है;
जिसे फिर से चार समूहों में उप-विभाजित किया गया है , मुलसेई ,खेड़ा और खामदार और भीका ये राठौड़ के चार पुत्रों पर आधारित समूह) है ।
राजस्थान का भीकानगर ही बीकानेर हो गया ।

मथुरिया बंजारों का पहले ही ऊपर उल्लेख किया है जो उनका नाम मथुरा से सम्बद्ध होता है और माना जाता है कि वे धार्मिकों के रूप में थे।

ब्राह्मणों ने इन्हें मूँज का यज्ञोपवीत पहनाया।
ये ही कालान्तरण में ब्राह्मण धर्म के संरक्षक हुए
ये ही लोग अपने को करौली से जोड़ने लगे ।
तीसरा विभाजन लावनांस

लबना (लवण)यानि साल्ट से सम्बद्ध है जो लवण (नमक)एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए इस्तेमाल किया था!

ये लोग फिर लव से स्वयं को सम्बद्ध मानने लगे ।
लव भगवान राम के पुत्र हैं , जो लावांस को इस लव के वंश से जोड़ते हैं।
धारीस (धादी) जाति के गोत्र हैं।
सबसे निचली रैंक( श्रेणि) प्राप्त करें उनकी कहानी के अनुसार, उनके पूर्वज गुरु नानक (सिख गुरु) के एक शिष्य थे !

जिनका साथ मुगल सम्राट हुमायूं ने दी था।

वहाँ वह गाय का मांस खाता है और शंकुधारी होकर मुसलमान बन जाते हैं और उसका खतना कर दिया जाता है।
फिर उन्होंने मुगल दरबार में एक संगीतकार के रूप में काम किया।
यह भाट चारणों में शामिल होकर अन्त में बंजारों का आश्रय बन गये।

वे धारी संगीतकार अथवा गायक हैं।
वे सरस्वती की पूजा करते हैं और उनके विवाह की एक भेंट बकरा ,गगी और गन्ध से होती है।
मूलभाव के दो पुत्र जो भाट थे मुसलमान बने।
ये ओतमल जिले की प्रयुक्त तहसील से सम्बद्ध हैं ।
जहाँ दोनों ने राठौड़ों के उप-समूह मे स्वयं को समायोजित किया हैै
-जिन्हें इतिहास कारों ने १- बड़ा राठौड़ और २- छोटा राठौड़ रूपों में प्रस्तुत किया है।
इनके निम्नलिखित कबीले बताए गए हैं
बाड़ा-राठौड़:
(1- खोला 2-रालोट 3- खटरोट 4- गेडावत 5- रसलिनया 6- डिडावत।

छोटा- राठौड़-बंजारा (१-मेघावत २- घेघावत ३-रालसोत ४- रामावत ५-खलखावत ६- मनलोत--हारावत ।
-तोलावत ९-धुधावत १०संगावत ११- पटोलोट ।।

ये दो प्रकार के हैं चारण बंजारा वैकल्पिक रूप से क्षेत्र में गोरमती कहा जाता है।
वास्तव आज बंजारों का रूपान्तरण राजपूतों के रूप में है।
ये प्राय: कुछ भूबड़िया के रूप में भी हैं ।
--जो चीमटा फूकनी आदि बनाये हैं।

राजपूतों का इतिहास भी अजीव या कहें निर्जीव है

जैसे कि माता हिंगलाज ने दुश्मनों की नजर से चार

राजपूतों को छुपा दिया , जिसको मुह पेड़ की (जड़) मे छुपाया वो जाजडेजा कहलाए ,

और जिन्हे चूलें छुपाया वे चुड मे छुपाया जाने से चुडासमा कहलाए , और जो शेरी की भाटी (भाथी )में छुपाया वो भाटी कहलाए .)

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उद्धृत अंश भारत की बंजारा जाति और जनजाति -3"
लेखक S.G.DeoGaonkar
शैलजा एस. देवगांवकर पृष्ठ संख्या- (18)चैप्टर द्वितीय...
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Originally there were only one.
As a Rajput, then in the form of the second Banjara.
There has been a similar situation - -

After Bhuria, the important sub-class Bhuria is in Rathore;
Which is again subdivided into four groups, Mulsei Kheda and Khamdar (a group based on the four sons of Bhika Rathod).
Bhiknagar too became Bikaner.

Mathuria Bazar has already mentioned above that his name is associated with Mathura and it is believed that he was in the form of a religious.
These people started connecting themselves with Karauli.
Third partition lavanasanaSalt (salt) i.e. salt which they used to take from one place to another,
These people again believed to be associated with love.
Love is the son of Rama, who connects the lineage to the lineage.
Dharis (Dhari) are the tribes of caste.
Get the lowest rank according to his story, his ancestor was a disciple of Guru Nanak (Sikh Guru)
, With whom the Mughal emperor Humayun gave.

There he eats the flesh of the cow and becomes a conch, becomes a Muslim and is circumcised.
Then he worked as a musician in the Mughal court. This bhawan joined the barns and became a shelter for the buyers.

He is a striker composer and singer. They worship Saraswati and a gift from her marriage comes from herbs and smell.
Two sons of origin who became Muslims.
These are from the Tahsil used in Othamal district.
Where the two are the sub-groups of Rathodas - the history cars
1- Big Rathore and 2-small Rathore are presented,
The following clan has been described
Bada-Rathod:
(1-Opened 2-Ralot 3- Khatrot 4- Gedavat 5- Russellia-6-
Chhote-Rathod-Banjara (1-Meghavat 2-Ghaghav 3-Resolutions 4- Ramavat 5-Khalkhawat-6-Manlot-Harawat
-Returning 9-stunned 10-sympathetic 11-footolote ..

These are of two types: Charan Banjara is alternatively called Gormati in the area.
Today the conversion of Banjars is in the form of Rajputs.
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The excerpted portion of India's Banjara caste and tribe-3 "
Author S.G.DeOGaonkar
Shelaja S. Devgaonkar page no- (18) chapter II ...

वर्तमान में करणी सेना के रूप में चारण और भाट समाज के लोग राजपूतों के रूप में एकत्रित हो रहे हैं

राजपूत थे भी नही तो पृथ्वीराज का राजपूत होने का तो सवाल ही नही पैदा होता क्योकि राजपूत शब्द का पुराने ग्रथो में कही भी कोई उससे ख नही है , ये शब्द ग्याहरवीं शताब्दी के बाद दिखाइ देता है।

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जिसे पुराणों तथा स्मृति कारों''ने इस प्रकार से वर्ण संकर (Hybrid) रूप में वर्णित किया है ।

ब्रह्मवैवर्तपुराणम् में भी राजपूत की उत्पत्ति का वर्णन

इसी करण कन्या को चारणों ने करणी माता के रूप में अपनी कुल देवी स्वीकार कर लिया है

जिसका विवरण हम आगे देंगे -

ज्वाला प्रसाद मिश्र ( मुरादावादी) 'ने अपने ग्रन्थ जातिभास्कर में पृष्ठ संख्या 197 पर राजपूतों की उत्पत्ति का हबाला देते हुए उद्धृत किया कि ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ब्रह्मवैवर्तपुराणम्‎ (खण्डः १ -(ब्रह्मखण्डः)

← अध्यायः१० ब्रह्मवैवर्तपुराणम्

श्लोक संख्या १११

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क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रो बभूव ह ।।

राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तितः।।

1/10।।111

ब्रह्मवैवर्तपुराणम् में भी राजपूत की उत्पत्ति

क्षत्रिय से करण (चारण) कन्या में राजपूत उत्पन्न हुआ और राजपुतानी में करण पुरुष से आगरी उत्पन्न हुआ ।

तथा स्कन्द पुराण सह्याद्रि खण्ड अध्याय 26 में राजपूत की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए कहा

" कि क्षत्रिय से शूद्र जाति की स्त्री में राजपूत उत्पन्न होता है यह भयानक, निर्दय , शस्त्रविद्या और रण में चतुर तथा शूद्र धर्म वाला होता है ;और शस्त्र वृत्ति से ही अपनी जीविका चलाता है ।

( स्कन्द पुराण सह्याद्रि खण्ड अध्याय 26)

और ब्रह्मवैवर्तपुराणम् में भी राजपूत की उत्पत्ति

क्षत्रिय से करण (चारण) कन्या में राजपूत उत्पन्न हुआ और राजपुतानी में करण पुरुष से आगरी उत्पन्न हुआ ।

आगरी संज्ञा पुं० [हिं० आगा] नमक बनानेवाला पुरुष ।

लोनिया

ये बंजारे हैं ।

प्राचीन क्षत्रिय पर्याय वाची शब्दों में राजपूत ( राजपुत्र) शब्द नहीं है ।

विशेष:- उपर्युक्त राजपूत की उत्पत्ति से सम्बन्धित पौराणिक उद्धरणों में करणी (चारण) और शूद्रा

दो कन्याओं में क्षत्रिय के द्वारा राजपूत उत्पन्न होने में सत्यता नहीं क्योंकि दो स्त्रियों में एक पुरुष से सन्तान कब से उत्पन्न होने लगीं ।

और रही बात राजपूतों की तो राजपूत एक संघ है

जिसमें अनेक जन-जातियों का समायोजन है ।

चारण, भाट , लोधी( लोहितिन्) कुशवाह ( कृषिवाह) बघेले आदि और कुछ गुर्जर जाट और अहीरों से भी राजपूतों का उदय हुआ ।

"ब्रह्म वैवर्तपुराण में राजपूतों की उत्पत्ति क्षत्रिय के द्वारा करण कन्या से बताई "

करणी मिश्रित या वर्ण- संकर जाति की स्त्री होती है

ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार करण जन-जाति वैश्य पुरुष और शूद्रा-कन्या से उत्पन्न है।

और करण लिखने का काम करते थे ।

ये करण ही चारण के रूप में राजवंशावली लिखते थे ।

एेसा समाज-शास्त्रीयों ने वर्णन किया है ।

तिरहुत में अब भी करण पाए जाते हैं ।

लेखन कार्य के लिए कायस्थों का एक अवान्तर भेद भी करण कहलाता है ।

करण नाम की एक आसाम, बरमा और स्याम की जंगली जन-जाति है ।

क्षत्रिय पुरुष से करण कन्या में जो पुत्र पैदा होता उसे राजपूत कहते हैं।

वैश्य पुरुष और शूद्रा कन्या से उत्पन्न हुए को करण कहते हैं ।

और ऐसी करण कन्या से क्षत्रिय के सम्बन्ध से राजपुत्र (राजपूत) पैदा हुआ।

वैसे भी राजा का वैध पुत्र राजकुमार कहलाता था राजपुत्र नहीं ।

चारण जो कालान्तरण में राजपूतों के रूप में ख्याति-लब्ध हुए और अब इसी राजपूती परम्पराओं के उत्तराधिकारी हैं ।

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स्कन्द पुराण के सह्याद्रि खण्ड मे अध्याय २६ में

वर्णित है ।

शूद्रायां क्षत्रियादुग्र: क्रूरकर्मा: प्रजायते।

शस्त्रविद्यासु कुशल: संग्राम कुशलो भवेत्।१

तया वृत्या: सजीवेद्य: शूद्र धर्मा प्रजायते ।

राजपूत इति ख्यातो युद्ध कर्म्म विशारद :।।२।

कि राजपूत क्षत्रिय द्वारा शूद्र कन्याओं में उत्पन्न सन्तान है

जो क्रूरकर्मा शस्त्र वृत्ति से सम्बद्ध युद्ध में कुशल होते हैं ।

ये युद्ध कर्म के जानकार और शूद्र धर्म वाले होते हैं ।

ज्वाला प्रसाद मिश्र' मुरादावादी'ने जातिभास्कर ग्रन्थ में पृष्ठ संख्या १९७ पर राजपूतों की उत्पत्ति का एेसा वर्णन किया है ।

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स्मृति ग्रन्थों में राजपूतों की उत्पत्ति का वर्णन है

राजपुत्र ( राजपूत)वर्णसङ्करभेदे (रजपुत) “वैश्यादम्बष्ठकन्यायां राजपुत्रस्य सम्भवः”

इति( पराशरःस्मृति )

वैश्य पुरुष के द्वारा अम्बष्ठ कन्या में राजपूत उत्पन्न होता है।

इसी लिए राजपूत शब्द ब्राह्मणों की दृष्टि में क्षत्रिय शब्द की अपेक्षा हेय है ।

राजपूत बारहवीं सदी के पश्चात कृत्रिम रूप से निर्मित हुआ ।

पर चारणों का वृषलत्व कम है ।

इनका व्यवसाय राजाओं ओर ब्राह्मणों का गुण वर्णन करना तथा गाना बजाना है ।

चारण लोग अपनी उत्पत्ति के संबंध में अनेक अलौकिक कथाएँ कहते हैं; ।

कालान्तरण में एक कन्या को देवी रूप में स्वीकार कर उसे करणी माता नाम दे दिया करण या चारण का अर्थ मूलत: भ्रमणकारी होता है ।

चारण जो कालान्तरण में राजपूतों के रूप में ख्याति-लब्ध हुए और अब इसी राजपूती परम्पराओं के उत्तराधिकारी हैं ।

करणी चारणों की कुल देवी है ।

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सोलहवीं सदी के, फ़ारसी भाषा में "तारीख़-ए-फ़िरिश्ता नाम से भारत का इतिहास लिखने वाले इतिहासकार, मोहम्मद क़ासिम फ़िरिश्ता ने राजपूतों की उत्पत्ति के बारे में लिखा है ।

कि जब राजा,

अपनी विवाहित पत्नियों से संतुष्ट नहीं होते थे, तो अक्सर वे अपनी महिला दासियो द्वारा बच्चे पैदा करते थे, जो सिंहासन के लिए वैध रूप से जायज़ उत्तराधिकारी तो नहीं होते थे, लेकिन राजपूत या राजाओं के पुत्र कहलाते थे। 7-8

सन्दर्भ देखें:- मोहम्मद क़ासिम फ़िरिश्ता की इतिहास सूची का ...

[7] "History of the rise of the Mahomedan power in India, till the year A.D. 1612: to which is added an account of the conquest, by the kings of Hydrabad, of those parts of the Madras provinces denominated the Ceded districts and northern Circars : with copious notes, Volume 1". Spottiswoode, 1829. पृ॰ xiv. अभिगमन तिथि 29 Sep 2009

[8] Mahomed Kasim Ferishta (2013). History of the Rise of the Mahomedan Power in India, Till the Year AD 1612. Briggs, John द्वारा अनूदित. Cambridge University Press. पपृ॰ 64–. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-108-05554-3.

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विशेष:- उपर्युक्त राजपूत की उत्पत्ति से सम्बन्धित पौराणिक उद्धरणों में करणी (चारण) और शूद्रा

दो कन्याओं में क्षत्रिय के द्वारा राजपूत उत्पन्न होने में सत्यता नहीं है क्योंकि दो स्त्रियों में एक पुरुष से सन्तान कब से उत्पन्न होने लगीं

'परन्तु कुछ सत्य अवश्य है कि राजपूतों के अन्तर्गत कुछ वर्ण संकर जातियों या भी समावेश हुआ ।

परन्तु राजपूत सत्यनिष्ठा पर दिनचर्या वितीत करने वाले

आन पर कुर्बान होने वाले और दु:खियों के रक्षक होते थे और आज हैं भी वे ही प्राचीन राजाओं के वंशज हैं

कालान्तरण में राजपूत एक संघ बन गया

जिसमें कुछ अनेक चारण' भाट तथा विदेशी जातियों शक सीथियन का समावेश हो गया।

और रही बात आधुनिक समय में राजपूतों की तो ;

राजपूत एक संघ है ।

जिसमें अनेक जन-जातियों का समायोजन है ।

जैसे

चारण, भाट , लोधी( लोहितिन्) कुशवाह ( कृषिवाह) बघेले आदि और कुछ गुर्जर जाट और अहीरों से भी राजपूतों का उदय हुआ ।

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' परन्तु बहुतायत से चारण और भाट या भाटी बंजारों का समूह ही राजपूतों में समायोजन हुआ है ।

ये चारण और भाट ब्रजभाषा की पिंगल और डिंगल शैली में गायन और कविताओं की रचना करते थे ।

करणी माता एक चारण कन्या थीं

आज राजपूतों कि गठन करणी सेना के बैनर तले हो रहा है

मुगल काल से राजपूत शब्द प्रकाश में आया

कुछ प्रसिद्ध इतिहास भी कहते हैं ।

इनके बचपन का नाम रिदु बाई था। बाल्यकाल में ही कई प्रकार के चमत्कार दिखलाने से रिदु बाई करणी माता कहलाई। इनका विवाह साठीका बीकानेर के देपाजी बीठू के साथ हुआ। इनके वंशज देपावत कहलाते है।

इनके बचपन का नाम रिदु बाई था।

इन्हें बीकानेर के राठौड़ राजवंश अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते है।