क्या समाज को वर्ण व्यवस्था के नाम पर विकृत करने का स्मृति ग्रंथों का कोई योगदान नहीं?

तनिक अपने विद्वानों को बुलाओ और इन श्लोकों और दोहे का सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करें। क्या ये श्लोक मिशनरियों द्वारा बनाए गए थे? उन्होंने इसका फायदा उठाया परंतु वे हिन्दू धर्म में व्याप्त जरूर थे। "स्त्रीशूद्रौ नाधीयताम " अर्थात् स्त्री और शूद्र ज्ञान प्राप्त न करें सायद ब्राह्मणों को ज्ञात था कि ज्ञान ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है । और ---जो व्यक्ति शक्ति सम्पन्न है , वह किसी की दासता स्वीकार नहीं करेगा । मनु-स्मृति में वर्णित विधान शूद्रों के दमन हेतु निर्धारित किये गये थे । :- धर्मोपदेश विप्राणाम् अस्य कुवर्त: । तप्तम् आसेचयेत् तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिव:।। ------------------------------------ --- यदि शूद्र ब्राह्मणों का धर्म उपदेश श्रवण कर रहा हो अथवा किसी को धर्म उपदेश कर रहा हो तो गर्म (तप्त) तैल को राजा इसके कान और मुँह में डलबा दे ---------------------------------------------------------- अर्थात् शूद्रों को केवल ब्राह्मण समुदाय का आदेश सुनकर उसे शिरोधार्य करने का कर्तव्य नियत था , उन्हें धर्म संगत करने का भी अधिकार नहीं था , यदि वे ऐसा कर भी लेते आत्म-कल्याण की भावना से तो, वैदिक विधान पारित कर , शूद्र जन-जाति की ज्ञान प्राप्त करने की चेष्टा पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया गया.और इसका दण्ड भी बड़ा ही यातना-पूर्ण था । उनके मुख और कानों में तप्त तैल डाल दिया जाता था -------------------------------------------------------------- सभी वर्णों का अपराध कुछ आर्थिक दण्ड के रूप में निस्तारित हो जाता था , परन्तु शूद्रों के लिए केवल मृत्यु का ही विधान था ... ---------------------------------------------------- देखें ---शतं ब्राह्मण माक्रश्य क्षत्रियो दण्डं अर्हति। वैश्योप्यर्ध शतं द्वेवा शूद्रस्तु वधम् अर्हसि ।।। (मनु-स्मृति-- ८/२६७/) मनु-स्मृति में वर्णित है ,कि ब्राह्मण बुरे कर्म करे तब भी पूज्य है । क्योंकि ये भू- मण्डल का परम देवता है । देखें--- राम चरित मानस के अरण्यकाण्ड मे तुलसी दास लिखते हैं । " पूजयें विप्र सकल गुण हीना । शूद्र ना पूजिये ज्ञान प्रवीणा ।। _________________________________ अर्थात् ब्राह्मण व्यभिचारी होने पर भी पूज्य है , परन्तु शूद्र विद्वान होने पर भी पूज्य नहीं है " ------------------------------------------- मनु स्मृति में भी कुछ ऐसा ही लिखा है । -------------------------------------------------- एवं यद्यपि अनिष्टेषु वर्तन्ते सर्व कर्मसु । सर्वथा ब्राह्मणा पूज्या: परमं दैवतं हितत् ।। -------------------------------- मनु-स्मृति-९/३१९ निश्चित रूप से तुलसी दास जी ने मनु-स्मृति का अनुशरण किया है । मनु के नाम पर निर्मित मनु-स्मृति में पुष्य-मित्र सुंग के निर्देशन में.... ब्राह्मणों ने विधान पारित कर दिया :--- कि शूद्र ब्राह्मण तथा अन्य क्षत्रिय वर्णों का झूँठन ही खायें , तथा उनकी वमन (उल्टी)भी चाटे .. देखें--- __________________________________________ उच्छिष्टं अन्नं दातव्यं जीर्णानि वसनानि च । पुलकाश्चैव धान्यानां जीर्णाश्चैव परिच्छदा:।। ------------------------------------------------ ---अर्थात् उस शूद्र या सेवक को उच्छिष्ट झूँठन बचा हुआ भोजन दें । फटे पुराने कपड़े , तथा खराब अनाज दें... ---------------------------------------------------- क्या खाद्य है ? क्या अखाद्य है ? इसका निर्धारण भी तत्कालीन ब्राह्मण समाज के निहित स्वार्थ को ध्वनित करता है। यहाँ ब्राह्मण समाज की कुत्सित मानसिकता व कपट भावना मुखर हो गयी है । ______________________________ अर्थात् ब्राह्मण माँस भक्षण करे , तो भी यह धर्म युक्त है ब्राह्मण हिंसा (शर्मण) करे , तब यह मेध है । जैसा कि कहा मनु-स्मृति में------- "वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति" मनु-स्मृति- में देखें--- ब्राह्मण को माँस खाने का विधान पारित हुआ है । ----------------------------------------------------------- विधान....... --यज्ञार्थ ब्राह्मणैर्वध्या: प्रशस्ता मृगपक्षिण: प्रोक्षितं भक्षयन् मासं ब्राह्मणानां च काम्यया ।। ----------------------------------------------------------------- अर्थात् - ब्राह्मण पशु ,पक्षीयों का , यज्ञ के लिए अत्यधिक वध करें । तथा अपनी इच्छानुसार ब्राह्मण उनके मांस को धोकर खायें
स्मृति ग्रंथों में कुरीतियों की भरमार है ये तथ्य समस्त हिंदुओ को समझना और मानना चाहिए। सत्यता का सरोकार धर्मांधता की उबड़ खाबड़ स्थान में नहीं, निष्पक्षता के समतल पृष्ठिभूमि पर ही हो सकती है।